________________
रत्नपालचरित में बिम्बात्मकता
Dराय अश्विनी कुमार Oहरिशंकर पाण्डेय
कवि के विराट हृदयाकाश से अनुभूतिगत शब्द, कल्पना, भावना रमणीयता आदि का साहचर्य प्राप्त कर प्राणों के तरंगों पर बैठकर बाहर उच्छलित होते हैं, उन्हीं शब्दों को संसार में काव्य कहा जाता है, जिसमें सत्य और शिव सुन्दर के रूप में उपस्थित होते हैं। हेय और उपेक्ष्य का सर्वथा तिरोहण हो जाता है, केवल आस्वाद्य ही शेष रहता है।।
संसार के सम्पूर्ण साहित्य में काव्य का महनीय स्थान है और कवि उदात्त एवं भव्यता के रामणीक स्थल में प्रतिष्ठित रहता है । संसार में कवि शब्द को धारण करने वाले अनन्त मिलते हैं, लेकिन कवि के अन्वर्थ को अपने व्यक्तित्व में संघटित करनेवाले विरले ही होते हैं। समाधि, साधना, शास्त्राभ्यास, गुरु-सन्निधि और पूर्व संस्कारवशात् कभी-कभी कोई पुरुषार्थी मधुमय-निकेतन में पहुंच जाता है । जिनके जीवन में स्वपर के भाव सर्वथा समाप्त हो जाते हैं और जो आत्म प्रदेश गमन समर्थ हो जाते हैं वे ही कवि कहलाते हैं, तब वाल्मीकि की तरह रामायण का, व्यास की तरह महाभारत का, कालिदास की तरह शकुन्तला का और भवभूति की तरह उत्तररामचरित का संगायक पैदा होता है। जिसके संगीत में जीव-जगत् की शाश्वत स्वर लहरियां अनन्तकाल तक अनुगूजित होती हैं ।
विवेच्य महाकवि-महाप्रज्ञ तेरापन्थ धर्मसंघ का दशम आचार्य भी इसी उदात्त परम्परा के एक महाय॑ मणि हैं। जिसकी यात्रा प्रारम्भ होती है घनान्धकार से लेकिन नित्य नवीनता को प्राप्त कर वे वहां पहुंच गए हैं जहां शैत्य-पावनत्व-विशिष्ट प्रकाश-सम्पन्न चिन्मयदीप ही अवशिष्ट रहता है । ये सिद्ध सारस्वत और वाणी के निपुण-लास्य में चतुर तो हैं ही, साधना
और समाधि के दुर्गम-प्रदेशों में स्वच्छन्द गमन समर्थ यात्री भी हैं। यह महाकवि के लिए आवश्यक भी है कि शास्त्रीय अक्षरों के साथ पूर्णाक्षर की साधना हो । इस कला में हमारा महाकवि पूर्णतया निपुण है।
ऐसे हृदय से निःसृत नैसर्गिक शब्द बाहर आते ही श्रोता संसार में
खण्ड १९, अंक ४
२६३
Jain Education International
For Private & Personal Use Only
www.jainelibrary.org