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________________ जिसे कि 'परमेष्ठी मंत्र' तथा 'पंचमंगल महाश्रुत स्कन्ध' भी कहा जाता है, उसके टीकाकार अभयदेव सूरि ने इस पद पर विस्तृत वृत्ति/टीका रची है। ‘णमो अरहंताणं' में "अरहन्त पद" की व्याख्या करते हुए श्रीमद् अभयदेवसूरि का कथन है कि-"अमर वरविनिर्मिताशोकादि महाप्रातिहार्य रूपां पूजामहन्तीत्यर्हन्तः"-अर्थात् देवों द्वारा रचित अशोक वृक्षादि (आठ) महाप्रातिहार्य रूप पूजा के जो योग्य हैं, वे अर्हन्त कहलाते हैं । इसी प्रकार का कथन आवश्यक नियुक्ति में भी है ।२। ___ 'अरहताणं' पद की व्याख्या अभयदेव सूरी दूसरी प्रकार से भी करते हैं "अथवा अविद्यमानं वा रह:-एकान्त रूपो देशः अन्तश्च:--मध्यं गिरिगुहादीनां सर्ववेदितया समस्तवस्तुस्तोमगतप्रच्छन्नत्वस्याभावेन येषां ते अरहोऽन्तरः" अथवा यहां 'अरहताणं का अरहोन्तर्ग्य: ऐसा अर्थ भी निकलता है । 'रहः' यानि एकान्त गुप्त प्रदेश और 'अंतर' अर्थात् पर्वत की गुफा आदि का मध्य भाग । तात्पर्य यह है कि सर्वज्ञ होने से भगवान से जगत् की सर्व वस्तुओं में से कोई गुप्त नहीं होती । अतः भगवान् अरहोन्तर कहलाते हैं। "अथवा अविद्यमानो रथः-स्यन्दनः सकलपरिग्रहोपलक्षणभूतोऽन्तश्च विनाशो जराधुपलक्षणभूतो येषां ते अरथान्ताः" अथवा यहां 'अरहंताणं' का 'अरथोन्तेभ्यः' ऐसा अर्थ भी संभव है। 'रथ' शब्द का उपलक्षण से 'सर्व प्रकार का परिग्रह' ऐसा अर्थ समझना । 'अंत' यानि विनाश तथा उपलक्षण से (जन्म) जरा वगैरह भी समझना। अर्थात् जिनके सर्व प्रकार का परिग्रह और जन्म, जरा, मृत्यु नहीं है, ऐसे अरथान्त अरहंत भगवान् को नमस्कार हो । पुन: व्याख्या करते हैं—'अथवा' 'अरहताणं' ति क्वचिदप्यासक्तिमगच्छद्भ्यः क्षीणरागत्वात् अर्थात् 'अरहताणं' राग का क्षय होने से किसी भी पदार्थ पर आसक्ति नहीं होने से अरहंत भगवन्तों को नमस्कार हो । भिन्न रूप से पुनः व्याख्या करते हैं-"अथवा अरहयद्भ्यः -प्रकृष्टरागादिहेतुभूतमनोज्ञेतरविषय-संपर्केऽपि वीतरागत्वादिकं स्वं स्वभावमत्यजद्भ्यः इत्यर्थ:"-अथवा 'अरहंताणं' यानि अरहयद्भ्यः (रह, धातु का त्याग देना अर्थ होता है) अर्थात् प्रकृष्ट राग तथा द्वेष के कारणभूत अनुक्रम से मनोहर तथा अमनोहर विषय का संपर्क होने पर भी वीतरागत्व आदि जो अपना स्वस्वभाव है, उसका त्याग नहीं करने वाले-ऐसे अरहंत भगवन्तों को नमस्कार हो । ___ अन्य पाठान्तर का उल्लेख करते हुए सूरिदेव कहते हैं--'अरिहंताण' ति पाठान्तरम् तत्र कर्मारिहन्तृभ्यः, आह च१. भगवती वृत्ति १. १. प्रका. जिनागम प्रकाशक सभाः बम्बई, अनु. संशो.-पं. बेचरदासजी। २. आव. नि. गा. ६२१ अरहंति वंदणनमंसणाणि अरहंति पूयसङ्घारं। सिद्दिगमणं च अरहा अरहंता तेण वच्चंति ॥ ३. भगवती सूत्र वृत्ति, १.१ प्रका.-जिनागमप्रकाशक सभा, अनु. पं. बेचरवासजी। ४. भ. वृ. १.१ ५. भ. वृ. १.१ ६. वही ७. वही ८. वही खण्ड १७, अंक २ (जुलाई-सितम्बर, ६१) ८५ For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.524567
Book TitleTulsi Prajna 1991 07
Original Sutra AuthorN/A
AuthorParmeshwar Solanki
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1991
Total Pages96
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Tulsi Prajna, & India
File Size5 MB
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