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________________ थे। चतुर्दशपूर्वी का अधिक महत्व था, उन्हें 'श्र त-केवली' कहा गया है। जिस प्रकार चतुर्दशपूर्वी हैं, क्या उसी तरह 11,12,13 पूर्वी भी होते हैं ? आचार्य द्रोण ने कहा है कि इस अवसर्पिणी में चौदह पूर्वधर के बाद दस पूर्वी ही होते हैं, 11,12,13 पूर्वी नहीं। सेनप्रश्न {पत्र 106] में कहा गया है कि जिस प्रकार चौदह पूर्वधर, दस पूर्वधर, नो पूर्वधर हुए हैं, उसी प्रकार एक से आठ पूर्वधर भी होने चाहिये। क्योंकि जीतकल्प की वत्ति में आचार-प्रकल्प से आठ पूर्व तक के धारक को 'श्र त-व्यवहारी' कहा गया है। आगमों की भाषा आगमों की भाषा अर्ध-मागधी है। जैन तीर्थंकर अर्ध-मागधी में उपदेश देते हैं। इसे उस समय की दिव्य-भाषा माना है। यह प्राकृत का ही एक रूप है। यह मगध के एक भाग में बोली जाती थी, इसलिये अर्ध-मागधी कहलायी। इसमें मागधी और दूसरी 18 भाषाओं के लक्षण मिश्रित हैं, इसलिये भी इसे अर्ध-मागधी कहा गया । इसमें देश्यशब्दों की भी बहुलता है। यह इसलिए कि विभिन्न जाति, देश और कुल के व्यक्ति भगवान् महावीर के तीर्थ में प्रवजित हुए, अत: उनकी भाषाओं का मिश्रण स्वाभाविक था। मागधी और देश्य-शब्दों का मिश्रण अर्ध-मागधी है । इसे 'आर्ष' या 'आर्य' भी कहा जाता है।' 1. जैन दर्शन के मौलिक तत्त्व, भाग 1, पृ० 62। 2. ओघनियुक्ति वृत्ति-पत्र 3। 3. प्राकृत आदि छह भाषाओं में ‘मागधी' भी एक है। इसमें 'र' और 'स' को 'ल' और 'स' मागध्यां रसौ लसौ] हो जाता है। यह मागधी का लक्षण है। जो भाषा इस समग्र लक्षण से युक्त नहीं होती उसे अर्ध-मागधी कहा गया है। (समवायांग सूत्र-अभयदेवसूरी कृत वृत्ति-पत्र 59 4. भगवं च णं अद्धमागहीए भासाए धम्ममाइक्खइ-समवायांग वृत्ति-पत्र 60 । 5. देवा णं अद्धमागहाए भासाए भासंति - भगवती 514। 6. देखो जैन दर्शन के मौलिक तत्त्व, भाग 1, पृ० 430 का टि. 10 । प्राकृत को स्वाभाविक और संस्कृत को विकृत, आगंतुक भाषा माना जाता था। तित्थगरेहिं वइजोगेण पभासिते हि गणधरेहिं वइजोगेण चेव सुत्तीकतं, तं पुण गहितं.... पागत-भासाए, स सभावगुण:, वैकृत स्तु संस्कृतभाषा, आगंतुक इत्यर्थ । . सूत्रकृतांग चूर्णि, पृ. 17। 7. मगधविसयभासाणिबद्ध अद्धमागई - निशीथ चणि 8. अट्ठारसदेसीभासाणिबद्ध वा अद्धमागइं-निशीथ चूर्णि 9. (क) सक्कता पागता चेव दुहा भणितीओ आहिया। सरमंडलम्मि गिज्जते पसत्था इसिभासिया ॥ [स्थानांग 71394] (ख) हेम 81113 १४६ तुलसी प्रज्ञा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524515
Book TitleTulsi Prajna 1978 07
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreechand Rampuriya, Nathmal Tatia, Dayanand Bhargav
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1978
Total Pages142
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Tulsi Prajna, & India
File Size3 MB
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