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हो और कार्य यदि अशुभ प्रयोजन से किया गया है तो अशुभ ही होगा चाहे परिणाम के रूप में उससे दूसरों को सुख हुआ हो ।"15 श्री सुशीलकुमार मैत्रा भी लिखते हैं- "शुभाशुभ का विनिश्चय बाह्य परिणामों पर नहीं वरन कर्ता के आत्मगत प्रयोजन की प्रकृति के आधार पर करना चाहिए।"16 तुलनात्मक दृष्टि से अपने-अपने हेतुवाद के समर्थन में जैन, बौद्ध और गीता के आचार दर्शनों में अद्भुत साम्य परिलक्षित होता है। हम विषय की गहराई में प्रवेश नहीं करते हुए मात्र तुलना की दृष्टि से धम्मपद और गीता के एक एक श्लोक को प्रस्तुत करेंगे। जैन ग्रन्थ पुरुषार्थ सिद्ध युपाय में आचार्य अमृतचन्द्र कहते हैं-"रागादि से रहित अप्रमाद युक्त आचरण करते हुए यदि प्राणघात हो जाए तो वह हिंसा हिंसा नहीं है अर्थात् ऐसा व्यक्ति निष्पाप होकर बन्धन में नहीं आता ।"17 बौद्ध ग्रन्थ धम्मपद में कहा गया है-"माता, पिता, दो क्षत्रिय राजा एवं अनुचरों सहित राष्ट्र का हनन करने पर भी वीततृष्ण ज्ञानी (ब्राह्मण) निष्पाप ही होता है ।"18 गीता कहती है जिसमें आसक्ति और कर्तृत्व भाव नहीं है वह इस समग्र लोक को मारकर भी न तो मारता है और न बंधन में आता है।" वस्तुतः ऐसी हिंसा हिंसा नहीं है ।19 यद्यपि समालोच्य आचार दर्शनों में इतनी वैचारिक एकरूपता है फिर भी जहां तक गीता और जैनाचार दर्शन का प्रश्न इस एकरूपता के होते हुए भी एक अन्तर है और वह अन्तर यह है कि गीता के अनुसार स्थित-प्रज्ञ अवस्था में रहकर हिंसा की जा सकती है जबकि जैन विचारणा कहती है कि इस अवस्था में रह कर हिंसा की नहीं जा सकती है, मात्र वह हो जाती है।
प्रश्न होता है कि यदि जैन चिन्तना को प्रयोजन या हेतुवाद स्वीकार्य है तो फिर उसे हेतुवाद के समर्थक बौद्ध दर्शन का उपहास करने या उसकी आलोचना करने का क्या अधिकार रह जाता है। लेकिन वस्तु स्थिति ऐसी नहीं है। यदि जैन चिन्तना को केवल हेतुवाद स्वीकार्य होता तो वह बौद्ध दार्शनिकों का उपहास नहीं करती। जैन विचारणा सैद्धान्तिक दृष्टि से हेतुवाद का विरोध नहीं करती है, उसका विरोध उस एकांगी हेतुवाद से है जिसमें व्यवहार की अवहेलना की जाती है। एकांगी हेतुवाद में जैन विचारणा ने जो
15. The Jain Ethics emphasiyes purity of motives as distinguished
from consequences of action. It considers an action to be right if it is actuated by good intention (37fHifa) though it leads to unhappiness to others. It considers an action to be wrong if it is actuated by bad intention though it leads to happiness
of others. History of Indian philosophy. 16. Hence right and wrong are to be determined not by objective
consequences but by the nature of the subjective intention of
the agent. Tne Ethics of the Hindus P. 289. 17. युक्ताचरणस्य सतो रागद्याबशमन्तरेणाऽपि ।
नहि भवति जातु हिंसा प्राणव्यपरोपणादेव ।।-पु० सि0 45 18. मातर पितरं हन्त्वा राजानो द्वे च खत्तिये।,
रठं सानुचरं हन्त्वा अनिघो याति ब्राह्मणो – धम्मपद, 294 19. यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमाल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ।। -गीता, 18117
तुलसी प्रज्ञा
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