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नैतिकता फलवाद की अवहेलना नहीं करती। विनय पिटक में ऐसे अनेकों प्रसंग है जहां कर्म के हेत को महत्त्व नहीं देकर मात्र कर्म परिणाम के लोक निन्दनीय होने के आधार पर ही उसका आचरण भिक्षुओं के लिए अविहित ठहराया गया है । भगवान बुद्ध के लिए कर्म परिणाम का अग्रावलोकन उतना ही महत्त्वपूर्ण है, जितना कि वह मिल और बेन्थम के लिए है।
जहां तक गीता की विचारणा का प्रश्न है, अपने आचार दर्शन में वह भी हेतुवाद का समर्थन करती है। गीताकार की दृष्टि में भी कर्म के नैतिक मूल्यांकन का आधार कर्म का परिणाम न होकर उसका हेतु ही है । गीता का निष्काम कर्मयोग का सिद्धांत “कर्मपरिणाम" की अपेक्षा कर्म-हेतु पर ही अधिक बल देता है । गीता में जिस आधार पर अर्जुन के लिए युद्ध के औचित्य का समर्थन किया गया है उसमें कम-हेतु को ही प्रमुखता दी गई है कर्म-परिणाम को नहीं । गीता में कृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि "(हे अर्जुन) अमुक कर्म का यह फल मिले यह हेतु (मन में) रखकर कर्म करने वाला न हो।" कार्य के परिणाम पर दृष्टि रखकर आचरण करना गीताकार को अभिप्रेत नहीं है, क्योंकि वह तो कर्म फल पर व्यक्ति का अधिकार ही नहीं मानता है । गीताकार की दृष्टि में कर्मफल पर दृष्टि रखकर आचरण करने वाले कृपण अर्थात् दीन या निचले दर्जे के हैं ।' बालगंगाधर तिलक भी गीता के आचार दर्शन को हेतुवाद का समर्थक मानते हैं, उनके अनुसार कर्म के बाह्य परिमाण के आधार पर नैतिक निर्णय देना असंगत है । वे लिखते हैं - कर्म छोटे बड़े हो या बराबर हो उनमें नैतिक दृष्टि से जो भेद हो जाता है, वह कर्ता के हेतु के कारण ही हुआ करता है। - (गीता में) भगवान ने अर्जुन से कुछ यह सोचने को नहीं कहा, कि युद्ध करने से कितने मनष्यों का कल्याण होगा और कितने लोगों की हानि होगी; बल्कि अर्जुन से भगवान यही कहते हैं; इस समय यह विचार गौण है कि तुम्हारे युद्ध करने से भीष्म मरेंगे या द्रोण। मुख्य प्रश्न यही है कि तुम किस बुद्धि (हेतु या उद्देश्य) से युद्ध करने को तैयार हुए हो यदि तम्हारी बुद्धि स्थित प्रज्ञों के समान शुद्ध होगी और यदि तुम उस पवित्र बुद्धि से अपना कर्तव्य करने लगोगे तो फिर चाहे भीष्म मरे या द्रोण; तुम्हें उसका पाप नहीं लगेगा। गीता कांट के समान संकल्प को ही समस्त कार्यों का मूल मानती है। गीता शांकर भाष्य में कहा गया है "सभी कामनाओं का मूल संकल्प है।"9 आचार्य शंकर ने मनुस्मृति (213) तथा महाभारत से उद्धरण देकर भी इसे सिद्ध किया है । महाभारत शान्ति पर्व में कहा गया है, . हे काम । मैं तेरे मूल को जानता हूं, तू निस्संदेह "संकल्प" से ही उत्पन्न होता है मैं तेरा संकल्प नहीं करूंगा, अत: फिर तू मुझे प्राप्त नहीं होगा।"10
यद्यपि अर्जुन के लिए युद्ध के औचित्य का समर्थन करते समय गीता कर्म के नैतिक मूल्यांकन के लिए बाह्य परिणाम पर विचार करने की दृष्टि को ओझल कर देती है और
6. मा फलेषु कदाचन, मा कर्मफल हेतुर्भूमा-गीता 2147 7. कृपणा:फलहेतवः - गीता 2149 8. गीता रहस्य, पृष्ठ 481।। 9. संकल्प मूलाहि सर्वकामाः । -गीता शांकर भाष्य 614 10. काम जानामि ते मूलं संकल्पान्त्वं हि जायसे ।
न त्वां संकल्पयिष्यामि तेन मे न भविष्यसि ।।—महा० शान्ति० 177125
खण्ड ४, अंक २ Jain Education International
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