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________________ सम्पादकीय आवाहन, स्थापन, सान्निधापन एवं विसर्जन की जैनसिद्धान्त-सम्मत विधियाँ आजकल मन्दिर में प्रतिष्ठित जिनप्रतिमा के विराजमान रहने पर भी पूजा करनेवाले प्रतिमा के सामने ही ठोना रखकर 'अत्र अवतर अवतर' (यहाँ उतरिये, यहाँ उतरिये) "अत्र तिष्ठ तिष्ठ" (यहाँ ठहरिये, यहाँ ठहरिये), "मम सन्निहितो भव भव" (मेरे निकट होइये, मेरे निकट होइये) कहते हुए जिनेन्द्र से अनुरोध करते हैं कि वे सिद्धशिला से उतरकर ठोने पर आकर विराजमान हो जायँ और मेरे निकटवर्ती बन जायँ। यह आग्रह करते हुए वे ठोने पर कुछ पुष्प या अक्षत रख देते हैं, और उन्हें सिद्धशिला से उतरकर आया हुआ जिनेन्द्रदेव मान लेते हैं, फिर उनकी पूजा करते हैं। यह संकल्पित जिन की अर्थात् जिन के अक्षतादिरूप प्रतीक की पूजा है। प्रतिष्ठित जिनप्रतिमा के विद्यमान रहते हुए जिनेन्द्र के अक्षतादिरूप प्रतीक की पूजा करना जैनसिद्धान्त के प्रतिकूल है, यह प्रतिष्ठित प्रतिमा का अनादर है। तथा आवाहन (जिनेन्द्रदेव को सिद्धशिला से बुलाना), स्थापन (उनसे ठोने पर बैठने का आग्रह करना) सान्निधीकरण (अपने समीप होने का अनुरोध करना) तथा विसर्जन (पूजा के बाद वापिस लौट जाने का निवेदन करना) के उपचार भी जैनसिद्धान्त-सम्मत नहीं हैं, क्योंकि जो जिनेन्द्रदेव सिद्ध होकर सिद्धालय में विराजमान हो गये हैं, वे पुनः मध्यलोक में नहीं आ सकते। इसलिए उन्हें बुलाना असंगत है। जैनसिद्धान्तसम्मत जिनपूजाविधि का सर्वप्रथम उल्लेख श्री सोमदेवसूरि (१०वीं सदी ई०) के यशस्तिलक उपासकाध्ययन' में मिलता है। उसमें पूजा के दो प्रकार बतलाये गये हैं : जिनप्रतिमापूजा और संकल्पित-जिनपूजा (कल्पित जिन की पूजा अर्थात् अक्षत, पुष्प आदि को जिनेन्द्रदेव मान कर उनकी पूजा)। यथा ___ "द्वये देवसेवाधिकृताः सङ्कल्पिताप्तपूज्यपरिग्रहः कृतप्रतिमापरिग्रहाश्च। सङ्कल्पोऽपि दलफलोपलादिष्विव न समयान्तरप्रतिमासु विधेयः। यत: शुद्धे वस्तुनि सङ्कल्पः कन्याजन इवोचितः। नाकारान्तरसङ्क्रान्ते यथा परपरिग्रहे॥ ४४७॥" (श्रावकाचारसंग्रह / भाग १/पृ० १७३) अनुवाद- "देवपूजा दो प्रकार से की जाती है : संकल्पित जिनेन्द्र को पूजकर एवं जिनप्रतिमा को पूजकर। (वे पुष्प, फल, पाषाण आदि जिन्हें जिनेन्द्रदेव मान लिया जाता है, संकल्पित जिन कहलाते हैं। इन्हें जिनप्रतीक (जिनेन्द्रदेव के प्रतीक) भी कहा जा सकता है। संकल्प (जिनेन्द्र देव की कल्पना) भी पुष्प फल, पाषाण आदि में ही किया जाना चाहिए, न कि अन्य मत की देवप्रतिमाओं में, क्योंकि जैसे कन्या (कुमारी युवती) में ही वधू का संकल्प किया जाता है, विवाहिता स्त्री में नहीं, वैसे ही शुद्ध वस्तु ही जिनदेव की कल्पना करनी चाहिए, अन्य देव का आकार धारण कर लेनेवाली वस्तु में नहीं।" संकल्पित जिन-पूजाविधि में आवाहन आदि नहीं संकल्पितजिन की पूजा विधि बतलाते हुए सोमेदेवसूरि कहते हैं अर्हन्नतनुमध्ये दक्षिणतो गणधरस्तथा पश्चात्। श्रुतगीः साधुस्तदन च पुरोऽपि दगवगमवृत्तानि॥ ४४८॥ भूर्जे फलके सिचये शिलातले सैकते क्षितौ व्योम्नि। हृदये चैते स्थाप्या: समयसमाचारवेदिभिर्नित्यम्॥ ४४९॥ (वही) अनुवाद- "पूजाविधि के ज्ञाताओं को सदा अरहन्त और सिद्ध (अतनु) को मध्य में, आचार्य (गणधर) 2 दिसम्बर 2009 जिनभाषित Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524346
Book TitleJinabhashita 2009 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2009
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size5 MB
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