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________________ अहिंसा और गाँधी श्री बालगंगाधर जी तिलक भगवान् महावीर का अहिंसा का उपदेश सर्वमान्य । है। दोनों धर्म प्राचीन और परस्पर सम्बन्ध रखनेवाले हैं। हो गया है। दया और अहिंसा की स्तुत्य प्रीति ने जैनधर्म | ग्रन्थों तथा सामाजिक व्याख्यानों से जाना जाता है कि जैनधर्म को उत्पन्न किया है, स्थिर रखा है। उसी से चिरकाल स्थिर | अनादि है, यह विशेष निर्विवाद तथा मतभेद रहित है। रहेगा। इसी अहिंसा-धर्म की छाप जब ब्राह्मणधर्म पर पड़ी | जैनधर्म की प्रभावना महावीर स्वामी के समय में हुई थी। तो हिन्दुओं को अहिंसा पालन करने की आवश्यकता हुई। उसी समय से जैनधर्म अस्खलित रीति से चल रहा है। अहिंसा की दया की विशेष प्रीति से कुछ लोगों के हृदय | चौबीस तीर्थङ्करों में महावीर स्वामी अन्तिम तीर्थङ्कर थे। हिंसा के दुष्कृत्यों से दुखने लगे और उन्होंने स्पष्ट कह | बौद्धधर्म की स्थापना से पूर्व जैनधर्म का प्रकाश फैल रहा दिया कि जिन ग्रन्थों में हिंसा का विधान हो, वे ग्रन्थ हमसे | था। यह बात विश्वास करने योग्य है। गौतमबुद्ध के दूर रखे जाएँ। इतिहास में बीस वर्ष का अन्तर है। बौद्धधर्म के तत्त्व जैनियों के उदार सिद्धान्त 'अहिंसा परमो धर्मः' ने | जैनधर्म के तत्त्वों के अनुकरण हैं। महावीर स्वामी की ब्राह्मणधर्म पर चिरस्मरणीय छाप छोड़ी है। पूर्व काल में | अहिंसा परमो धर्मः का उपदेश सर्वमान्य हो गया है। ब्राह्मण यज्ञ के लिए पशुहिंसा होती थी, इसके प्रमाण मेघूदत काव्य | | धर्म में भी अहिंसा मान्य हो गयी। तथा और भी अनेक ग्रन्थों में मिलते हैं। यज्ञादि से पशुवध महान् देशभक्त का महान् कर्त्तव्य-यह जानने के की घोर हिंसा की ब्राह्मण-धर्म से विदाई ले जाने का श्रेय | | लिए किसी विशेष परिश्रम की आवश्यकता नहीं है कि (पुण्य) जैनियों के हिस्से में है। ब्राह्मण-धर्म और जैनधर्म | महात्मा गाँधी का चरित्र शिक्षाप्रद और अनुकरणीय क्यों दोनों के झगड़े की जड़ हिंसा थी, वह अब नहीं रही है | है। यों तो महात्मा गांधी में और जितनी बातें हैं, वे प्रायः और इस रीति से ब्राह्मणधर्म अथवा हिन्दूधर्म को जैनधर्म | कुछ-न-कुछ बहुत से पढ़े-लिखे लोगों में पायी जाती हैं, ने अहिंसा-धर्म बनाया है। यज्ञ-यागादिकों में पशुओं का | परन्तु वास्तविक सुशील और सच्चरित्र मनुष्य बहुत ही कम वध होकर जो यज्ञार्थ पशहिंसा आजकल नहीं होती है. देखने में आते हैं। गाँधीजी में सबसे बडी विशेषता यह उसका कारण 'अहिंसा' धर्म का सर्वमान्य हो जाना है। | है कि वे सुशील और सच्चरित्र हैं। बहुत-सी बातों में लोगों शंकराचार्य ने जो ब्राह्मणधर्म का उपदेश किया है, उसमें | का उनसे मतभेद हो सकता है और बहुत से लोग अधिक धर्म का मख्य तत्त्व अहिंसा बतलाया है। अहिंसा और मोक्ष विद्वान भी मिल सकते हैं, पर उनमें जो महत्ता है, उसके का अधिकार दोनों ही धर्मों में एक सरीखा माना गया है। कारण वे सब लोगों के आदर्श हो सकते हैं। जिस समय पूर्वकाल में अनेक ब्राह्मण जैनधर्म के धुरन्धर विद्वान् हो | किसी को अपने कर्तव्य का ठीक ज्ञान हो जाय, उस समय गये हैं और विद्या के प्रसङ्ग में दोनों का पहिले से प्रगाढ़ उसे अपने सब स्वार्थ छोड़कर उस कर्त्तव्य के पालन में संबंध है। लग जाना चाहिए और इस बात की कुछ भी परवाह न सम्पूर्ण जैनी भाइयों तथा ब्राह्मणधर्म पालनेवालों को करनी चाहिए कि इस कर्त्तव्य-पालन के कारण मुझ पर परस्पर एक माँ-बाप के युगल पुत्रों की तरह एक ही पुरुष | अथवा मेरे परिवार पर भारी संकट आएँगे। उसे ईश्वर पर के दायें-बायें हाथ की तरह अपने को एक समझकर परस्पर भरोसा रखकर, निष्काम बुद्धि से अपने कर्त्तव्य-कर्म के हाथ मिलाके अपने 'अहिंसा' धर्म के अभ्युदय के लिए | पालन में लग जाना चाहिए। महात्मा गाँधी के चरित्र से भेदबुद्धि रहित होकर प्रयत्न करना चाहिए। मैं यद्यपि जैन | जो शिक्षाएँ ग्रहण की जा सकती हैं, उनमें से यह एक नहीं हूँ परन्तु मैंने जैनधर्म का इतिहास तथा उसके प्राचीन | मुख्य शिक्षा है। ग्रन्थों का अवलोकन किया है। साथ ही, जैनधर्मी मित्रों किसी देश की अवस्था सुधारने के लिए सबसे के संसर्ग से भी बहुत कुछ परिचय पाया है। इसलिए इन | पहले इस बात की आवश्यकता होती है कि उस देश की दो आधारों पर जैनधर्म पर कुछ कह पा रहा हूँ। जैनधर्म | सत्ता, उस देश के पूर्ण अधिकार उसी देश के निवासियों विशेषकर ब्राह्मणधर्म के साथ अत्यन्त निकट संबंध रखता | के हाथ में हों। बिना सत्ता के ना तो बुद्धिमत्ता ही काम अप्रैल 2008 जिनभाषित 17 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524327
Book TitleJinabhashita 2008 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2008
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size4 MB
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