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________________ निजात्म-रमण ही अहिंसा है। प० पू० आचार्य श्री विद्यासागर जी अहिंसा के अभाव में आत्मोपलब्धि असम्भव है।। प्राप्त होगी जो उन आचार्यों को प्राप्त हुई थी, इसको बाहर आना ही हिंसा है और अन्दर रहना ही अहिंसा | प्राप्त करने वाले कितने जीव होंगे? पर इसका अर्थ है। आत्मविकल हो जाना, आत्मा में आकुलता हो जाना | यह भी नहीं कि उसको कोई भी प्राप्त नहीं कर सकता ही हिंसा है। और न ही यह अर्थ है कि सभी प्राप्त कर लेंगे। 'जीओ और जीने दो' स्वयं जीओगे तभी दूसरे | मात्र अहिंसा का सूत्र आप लें। भगवान् महावीर को जीने दोगे, जिन्हें स्वयं अपना जीना ही पसन्द नहीं ने 'अहिंसा' की उपासना की, उनके पूर्व तेईस तीर्थंकरों उनसे क्रूर और निर्दयी और कौन हो सकता है? ने उपासना की और उनके पूर्वजों ने भी इस अहिंसा आप भी भगवान् हैं किन्तु एकमात्र हिंसा व अहिंसा की उपासना की। अहिंसा के अभाव में आत्मोपलब्धि का प्रतिफल है कि आप भगवान् के समान होकर भी नहीं कर सकते थे। उन्होंने इस अहिंसा के आलम्बन भगवान् का अनुभव नहीं कर पा रहे हैं। के लिये हम लोगों को भी प्रेरित किया है, आवश्यकता महावीर भगवान् के निर्वाण के उपरान्त तीर्थंकरों | है उस और दृष्टिपात करने की। का जो अभाव हुआ वह इस क्षेत्रगत प्राणियों का एक विश्व का प्रत्येक प्राणी शांति चाहता है, सुख प्रकार से अभाग्य ही कहना होगा। भगवान् के साक्षात् | की इच्छा रखता है और दुःख से भयभीत होता है। दर्शन व उनकी दिव्य-वाणी के पान करने का जब सौभाग्य | दुःख निवृत्ति के उपाय में अहर्निश प्रयास करते रहे प्राप्त होता है तो संसार की असारता के बारे में स्वयं | वही जीवन है, इस हेतु उपदेश भी संसारी जीवों के | लिये ही है, संसारी जीवों में भी उन जीवों के लिये से जो कार्य हो सकता था वह कार्य उनके उपरांत भी | है जो वस्तुतः सुख चाहते हैं, प्रत्येक के लिये नहीं। कर सकते हैं। आचार्य परम्परा अक्षुण्ण बनी रहे और हम सुख चाहते तो हैं, शान्ति चाहते तो हैं किन्तु तात्कालिक उनमें भी प्रौढ़ आचार्य जिनका जीवन हमारे लिये | सुख, भौतिक सुख चाहते हैं, इन्हीं की इच्छा करते हैं। प्रेरणादायक है वे आचार्यकल्प बने रहें। उन्होंने, जिस | कल देखा जायेगा, आगे कर लेंगे इसी मान के पीछे ओर भगवान् जा चुके हैं- पहुँच चुके हैं, उस ओर जाने | अनंत काल खो चुके हैं। का मार्ग प्रशस्त किया। जो संसार से ऊपर उठने की हम अनंतकालीन सुख की इच्छा रखते हैं कि इच्छा रखते हैं उन्हें एक प्रकार का दिग्दर्शन दिया है, | मैं सुखी बना रहूँ इसके लिये ही तो भगवान् ने अहिंसा दिशाबोध दिया है किंतु यह ध्यान रहे कि उनके दिग्दर्शन | का उपदेश दिया। वह अहिंसा बहत गहराई में ही अभी का लाभ लेना इतना आसान नहीं है जितना कि हम तक पड़ी हुई है। उस अहिंसा का दर्शन करना भी लोग समझते हैं। स्वरूप समझना भी इस प्रकार के व्यस्त जीवों के लिए उन्होंने जीवन भर मन्थन, चिन्तन व मनन करके, संभव नहीं है। यहाँ पर हजारों व्यक्ति विद्यमान हैं, किंतु नवनीत रूप में जो कुछ भी साहित्य प्रस्तुत किया, उसमें | वे सब यहाँ पर श्रवण कर रहे हैं ऐसा मैं दृढ़-निश्चय अवगाहन करना, उसमें से ही जो कुछ अपने चिन्तन | के साथ नहीं कह सकूँगा, यह भी नहीं कह सकूँगा के माध्यम से मैं निकाल सका हूँ वही आपके सामने | कि आप श्रवण कर ही नहीं रहे, श्रवण तो कर रहे प्रस्तुत कर रहा हूँ। | हैं, पर श्रवण करने में भी सबमें कुछ अन्तर हो सकता . आचार्यों के साहित्य में अध्यात्म की ऐसी धारा | है। इस समय प्रवचन समाप्ति की ओर बढ़ रहा है बही है कि कोई भी ग्रन्थ उठायें, कोई भी प्रसंग उठायें, | और आप के मस्तिष्क में ख्याल है कि प्रवचन समाप्त उन ग्रन्थों में से कोई भी गाथा ले लें, गाथा में भी कोई | हो और चलें, यह जो आकुलता है यह जो अशांति भी पद देखें, तो वह पाठक के लिये पर्याप्त होगा, उसमें | है, यह अशांति आप लोगों को उस अहिंसा से दूर रखने से वह रस, वह संवेदन, वह अनुभूति पाठक को भी । में कारण बनती है। आत्मा में आकुलता होना ही हिंसा मार्च 2008 जिनभाषित 4 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524326
Book TitleJinabhashita 2008 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2008
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size4 MB
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