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________________ विश्लेषण प्रस्तुत करने का प्रयत्न करते हैं। अपनी व्यक्तिगत | आधुनिक पद्धति से संपादन किये जाने की आवश्यकता मान्यताओं, विचारों एवं विश्वासों का उसमें मिश्रण नहीं | है। प्रकाशित ग्रन्थों की आलोचनात्मक निर्भीक समीक्षा की करते हैं। आवश्यकता है। इस सम्बन्ध में जैनों के सभी सम्प्रदायों संस्कृत, प्राकृत अथवा अपभ्रंश की रचनाओं का | के विद्वानों द्वारा तैयार की गयी सम्मिलित योजना कार्यकारी अध्ययन करने के पूर्व वे इन भाषाओं के व्याकरण, कोश, | हो सकती है। शोध कार्य को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने आदि का ठोस ज्ञान प्राप्त करते हैं। तुलनात्मक भाषा विज्ञान | के लिए पुस्तकालय अथवा पुस्तकालयों की आवश्यकता उनके अध्ययन में एक विशिष्ट स्थान रखता है। यूरोप | हैं जहाँ शोध सम्बन्धी हर प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध की आधुनिक भाषाओं में अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, डच आदि | हो सकें। ये भारत के कुछ केन्द्रीय स्थानों में स्थापति किये का ज्ञान उनके शोधकार्य में सहायक होता है। जैनधर्म का | जाने चाहिये तथा विद्यमान सुविधाओं का आधुनिकीकरण अध्ययन करनेवालों के लिए जर्मन भाषा का ज्ञान आवश्यक | किया जाय। अन्त में, एक महत्त्वपूर्ण बात और कहना है। इस भाषा में कितने ही महत्वपर्ण और उपयोगी ग्रन्थ | चाहता हूँ। वह यह है कि यथार्थता से सम्बन्ध स्थापित एवं लेख ऐसे हैं उदाहरणार्थ, जैन अध्ययन के लिए जैनधर्म | करने का प्रयत्न किया जाये। विषयों का चुनाव इस प्रकार और दर्शन का अध्ययन ही पर्याप्त नहीं, वैदिक धर्म, किया जाय जिससे शोध छात्र प्रोत्साहित हों और आगे बौद्धधर्म तथा यूरोपीय भाषाओं में हुए शोध का ज्ञान भी चलकर दिशा भी ग्रहण कर सकें एवं जैन विद्याओं को आवश्यक है। तुलना के लिए बौद्धधर्म का अध्ययन तो | प्रकाशित कर सकें। आवश्यक है ही। इस अध्ययन को व्यवस्थित करने के 'पं. कैलाश चन्द्र जी शास्त्री लिए चुने हुए जैन ग्रन्थों का चुने हुए जैन विद्वानों द्वारा । अभिनन्दन ग्रन्थ' से साभार आपके पत्र आपके सम्पादकत्व में जिनभाषित पत्रिका मेरी दृष्टि में, आजकल जितनी धार्मिक-पत्रिकाएँ निकल रही हैं, उनमें सर्वश्रेष्ठ पत्रिका है। आपका सम्पादकीय लेख तो हर पत्रिका में एक अद्भुत विद्वत्ता एवं अनुभव को लिए हुए होता है। यह समयानुकूल, बहुत सारगर्भित तथा स्पष्टवादिता का द्योतक होता है।। इसी प्रकार श्री रतनलाल जी साहब बैनाड़ा जी का 'जिज्ञासा-समाधान' नामक स्तम्भ तो बहुत ही स्पष्ट एवं भ्रांतियों का सच्चा समाधान-प्रदायक होता है। उसमें उनके समाधान व उत्तर देने की शैली जो कि स्वयं की ओर से न देकर, पूर्व-आचार्यों द्वारा और प्रसंग व शास्त्र व श्लोक-संख्या, पेज संख्या आदि देकर जो दी जाती है, बहुत ही प्रभावशाली एवं अकाट्य होती है। यह उनकी सादगी, सरलता व उत्कृष्ट बुद्धिमत्ता एवं स्वाध्यायशीलता का द्योतक है। श्रावक के षड्आवश्यक कार्यों में जो स्वाध्याय को परम-तप की संज्ञा दी जाती है, मालूम होता है कि वह शायद इसी प्रकार के स्वाध्याय की संज्ञा हो सकती है, न कि केवल सितम्बर 2007 की पत्रिका में 'पर्युषण के दिव्य आकाश पर प्रदूषण के बादल' नाम का जो लेख श्रद्धेय भैयाजी श्री त्रिलोक जी ने लिखा है, वह तो बहत ही सार्थक, समयानुकल एवं अक्षरश: स तो विद्वानों, प्रवचनकारों व पज्य साध-संतों के लिए भी विशेष ध्यान देने लायक एवं अनुकरणीय भी है। यदि सभी विद्वान्, लेखक व साधुगण धर्म की आड़ में फैल रही कुरीतियों व कुसंस्कारों को रोकने का इसी प्रकार का प्रयास करें, तो मैं समझता हूँ कम से कम 50-55 प्रतिशत तो कुसंस्कारों को कम किया जा सकता है। आशा है आप इस ओर अपना व विद्वानों का ध्यान आकर्षित करने की कृपा करेंगे तथा मुझ जैसे अज्ञानी ने जो आप जैसे महान्-विचारक, चिन्तक विद्वान् को सुझाव देने की धृष्टता की है, उसके लिए क्षमा करेंगे। बाबूलाल बरोदिया, अशोकनगर (म.प्र.) नवम्बर 2007 जिनभाषित 19 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524322
Book TitleJinabhashita 2007 11
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2007
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size4 MB
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