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________________ आत्मानुभूति ही समयसार आचार्य श्री विद्यासागर जी संसारी प्राणी को जो कि सुख का इच्छुक है उसे। जयपुर से आगरा की ओर जायेंगे तो आगरा का वीतराग, सर्वज्ञ, हितोपदेशी भगवान् उपदेश देकर हित का साइन बोर्ड मिलेगा और आगरा से जयपुर की ओर आयेंगे मार्ग प्रशस्त करते हैं। वे भगवान् जिनका हित हो चुका | तो जयपुर का साइन बोर्ड मिलेगा मील का पत्थर एक है फिर भी जो हित चाहता है उसके लिए वे हित का ही है मार्ग भी एक ही है दिशा बदल जाती है तो वही मार्ग प्रशस्त करते हैं । कृतकृत्य होने के उपरांत भी वे सहारा | आगरा जाता है और वही जयपुर जाता है। इस ओर से देते हैं और हमें भी भगवान् के रूप में देखना चाहते | जाते हैं तो आगरा लिखा मिलता है और उधर से आते हैं। संसारी प्राणी सुख का भाजन तो बन सकता है किंतु | हैं तो जयपुर लिखा मिलता है। 'सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि अपनी पात्रता को भला हआ है अपनी आत्म-शक्ति को | मोक्षमार्ग:'- सम्यग्दर्शन ज्ञान और चारित्र यह मार्ग मोक्ष का भला हआ है इसलिए सखी नहीं बन पाता। महावीर भगवान है। इसके विपरीत मिथ्यादर्शन ज्ञान और चारित्र यह संसार ने और उसके उपरांत होने वाले सभी आचार्यों ने इसी बात | का मार्ग बन जाता है। चलने वाला व्यक्ति एक है और पर जोर दिया कि हम जो भी धार्मिक क्रियाएँ करें, यह रास्ता भी एक ही है दिशायें दो हैं। और दिशा भी कोई सोचकर करें कि मैं भगवान् बनूं। क्योंकि मैं भगवान् बन | चीज नहीं है जब चलता है तब दिशा बनती है। जब गति सकता हूँ। सारी धार्मिक क्रियाएँ यदि इस लक्ष्य को लेकर | प्रारम्भ हो जाती है तब दिशा-बोध की आवश्यकता होती होती हैं तो श्रेयस्कर हैं। अन्यथा जिसे भगवान् बनने की है। जब चलना प्रारम्भ होता है तभी उल्टा-सीधा इस तरह कल्पना तक नहीं है तो उसकी सारी की सारी धार्मिक की बात ध्यान में रखना आवश्यक होता है। भगवान बनने क्रियाएँ सांसारिक ही कहलाएंगी। क्रियाएँ अपने आपमें न के लिए जो भी आगम के अनुरूप आप क्रिया करेंगे वह सांसारिक हैं न धार्मिक हैं, दृष्टि के माध्यम से ही वे धार्मिक सब मोक्षमार्ग बन जायेगा। मोक्षमार्ग पर क्रम से जब हम हो जाती हैं। कदम बढ़येंगे तो अवश्य सफलता मिलती चली जायेगी। ___चलना आवश्यक है किंतु दृष्टि बनाकर चलना है। सफलता क्रम के अनुरूप चलने से मिलती है और क्रम जब तक दृष्टि नहीं बनती तब तक चलने का कोई औचित्य | से मिलती है। नहीं है। जैसे आप गाड़ी चला रहे हैं चलाते-चलाते उसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्वारित्र तीनों मिलकर रोक देते हैं और रिवर्स में डाल देते हैं। गाड़ी चलती है | मोक्ष का मार्ग बनता है। यह हम सुनते हैं और सुनाते हैं। किंतु उल्टी-दिशा में चलने लगती है। मुख भले ही सामने | किंतु उस ओर हमारा जीवन ढलता नहीं है इसलिए है पर वह लक्ष्य की ओर न जाकर विपरीत जा रही है। | अनुभूति नहीं हो पाती। ज्ञान से भी अधिक महत्त्व अनुभूति इसीप्रकार दृष्टि के अभाव में सारी की सारी क्रियाएँ रिवर्स | को आचार्यों ने दिया है। अनुभूति के साथ ज्ञान तो रहता गाड़ी के अनुरूप हो जाती हैं, दिखता है कि हम जा रहे | ही है। ज्ञान पहले हो और अनुभूति बाद में हो ऐसा भी हैं। चल रहे हैं किंतु अभिप्राय यदि संसार की ओर हो | कोई नियम नहीं है ज्ञान जहाँ हो वहाँ अनुभूति हो ही यह भगवान् बनने का अभिप्राय न हो तो क्रियाएँ मोक्षमार्ग के | नियम नहीं है लेकिन जिस समय अनुभूति होगी उस समय अंतर्गत नहीं आ सकतीं। मोक्षमार्ग पर चलना तो तभी | ज्ञान अवश्य होगा। लौकिक दृष्टि से समझने के लिए जैसे कहलायेगा जब हमारी मोक्ष पाने की इच्छा हो और कदम | कोई डॉक्टर एम.बी.बी.एस हो जाता है तो भी उपाधि मात्र मोक्षमार्ग पर आगे बढ़ें पीछे की ओर न जायें। हमारे कदम से डॉक्टर नहीं कहलाता। उसे प्रेक्टिस करना भी अनिवार्य अपनी शक्ति के अनुरूप उसी ओर बढ़ें जिस ओर भगवान् | होता है। जो ज्ञान के माध्यम से परोक्ष रूप से जाना था गये हैं मुक्ति का पथ जिस ओर है। दो ही तो पथ हैं एक | उसे प्रेक्टिस के दौरान प्रत्यक्ष रूप से अनुभव करना होता मुक्ति का और दूसरा संसार का। वैसे मार्ग एक ही है मुक्ति | है। एक दो साल प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) लेना पड़ती है। तभी का लक्ष्य बनाकर सामने चलना मुक्ति का मार्ग है और | रोगी की चिकित्सा करने की योग्यता आती है। पीछे संसार का लक्ष्य बनाकर मुड जाना यही संसार का हमने ज्ञान किसलिए प्राप्त किया? तो कहना होगा मार्ग है। | कि उस वस्तु को जानने के लिए उस आत्म-तत्त्व की 4 अगस्त 2007 जिनभाषित Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524319
Book TitleJinabhashita 2007 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2007
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size5 MB
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