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________________ दिगम्बरजैन मुनियों की धार्मिक स्वतन्त्रता में हस्तक्षेप पर गाँधी जी का खेद-प्रकाशन ब्र.शान्तिलाल जैन राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने 'नवजीवन' (31 मई 1931) PREFACE TO THE SECOND ADITION में एक लेख लिखकर यह विचार व्यक्त किया था कि "In Appendix B are given some letters that दिगम्बरजैन मुनियों को नगरों में नग्न अवस्था में प्रवेश नहीं passed between Mahatma Gandhi and myself on the Subject of the nudity of Jaina Saints. Gandhiji has करना चाहिए। गाँधी जी के इस लेख को दिगम्बरजैन पत्रिका now cleared up his position in one of the issues of 'शोधादर्श' के सम्पादक महोदय ने मार्च 2005 के अंक में the NAWAJIWAN, where he has expressed disउद्धत कर गाँधी जी के विचार का समर्थन किया था। कुछ tress at the interference with the freedom of the Jaina Saints. The corresponence is, however, valuअन्य दिगम्बरजैन लेखकों ने भी उक्त पत्रिका में लेख लिखकर able as it is likely to clear up certain points and गाँधी जी के उक्त विचार को उचित ठहराया था और misconceptions in connection with the supject of the दिगम्बरजैन मुनियों को वस्त्रधारण करने की सलाह दी थी। tract, and has been incorporated, for this reason, इससे प्रोत्साहित होकर श्वेताम्बरजैन सम्प्रदाय की धार्मिक herein." New Delhi, 6. 3. 32. C. R. Jain पत्रिका 'स्थूलभद्र सन्देश' (मई 2006) ने भी महात्मा जी के उक्त उक्त लेख को 'शोधादर्श' के सम्पादक की टिप्पणी के अनुवाद-"एपेण्डिक्स'बी' में जैन मुनियों की नग्नता साथ उद्धृत किया था, जिसका उद्देश्य यह दर्शाना था कि | के विषय में कुछ पत्र दिये गये हैं, जिनका आदान-प्रदान श्वेताम्बरों की सवस्त्रमुक्ति की मान्यता को महात्मा गाँधी महात्मा गाँधी और मेरे बीच हुआ था। गाँधी जी ने अब और उक्त दिगम्बरजैन विद्वान् भी उचित मानते हैं। 'नवजीवन' के एक अंक में अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है, ___'जिनभाषित' के सम्पादक प्रो. रतनचन्द्र जैन ने जिसमें उन्होंने जैन मुनियों की स्वतन्त्रता में हस्तक्षेप करने दिसम्बर 2006 के अंक में सम्पादकीय लेख लिखकर पर दुःख व्यक्त किया है। तथापि यह पत्रव्यवहार महत्त्वपूर्ण उपर्युक्त विद्वानों के विचारों को अनेक मनोवैज्ञानिक, है, क्योंकि इससे उन कतिपय बिन्दुओं और भ्रान्त धारणाओं सामाजिक, धार्मिक एवं वर्तमान अश्लील सभ्यतागत यक्तियों का स्पष्टीकरण एवं निराकरण हो जाता है, जो ट्रैक्ट वे और प्रमाणों के द्वारा अनुचित ठहराया था तथा दिगम्बरजैन विषय ('जैनमुनियों की नग्नता') से सम्बद्ध हैं, इसी उद्देश्य सिद्धान्त के मर्मज्ञ तथा महान् विधिवेत्ता बैरिस्टर चम्पतराय से उन पत्रों को इस पुस्तक में समाविष्ट किया जा रहा है।" जी जैन के वे पत्र प्रकाशति किये थे, जो उन्होंने गाँधी जी को | इससे स्पष्ट हो जाता है कि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने उनके 'नवजीवन' (31 मई 1931) में अभिव्यक्त विचारों | दिगम्बर जैन मुनियों के नग्न अवस्था में नगरों में प्रवेश को के विरोध में लिखे थे। वह पत्र भी प्रकाशित किया था जो | उचित और धर्मस्वातन्त्र्य के लोकतांत्रिक सिद्धान्त के अनुरूप गाँधी जी ने बैरिस्टर चम्पतराय जी जैन के पत्र के उत्तर में | स्वीकार कर लिया था। अतः 'शोधादर्श' के सम्पादक जी लिखा था। | का एवं उसमें प्रकाशित लेखों के लेखकों का गाँधी जी के ___आगे चलकर गाँधी जी को बैरिस्टर चम्पतराय जी के विचारों का प्रमाण देकर दिगम्बरजैन मुनियों को वस्त्र धारण तर्क उचित प्रतीत हुए और उन्होंने अपने विचार बदल दिये, | करने की सलाह देना निराधार सिद्ध हो जाता है। अच्छा जिसे उन्होंने 'नवजीवन' के एक अंक में स्वीकार किया | होता, वे बैरिस्टर चम्पतराय जी और महात्मा गाँधी जी के था। इसका उल्लेख बैरिस्टर चम्पतराय जी ने अपनी पुस्तक बीच हुए पत्र-व्यवहार एवं चम्पतराय जी की उक्त प्रस्तावना 'NUDITY OF JAINA SAINTS' के द्वितीय संस्करण की | को पढ़कर अपने विचार प्रकट करते। प्रस्तावना में, जो 6 मार्च 1932 को लिखी गई थी, किया है। माननीय चम्पतराय जी ने अपनी एक अन्य पुस्तक वह इस प्रकार है | 'PRACTICAL PATH' में लिखा है -फरवरी 2007 जिनभाषित 5 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524314
Book TitleJinabhashita 2007 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2007
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size5 MB
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