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________________ परमम्।"३ अहिंसा और वर्तमान जीवनशैली डॉ.सुरेन्द्रकुमार जैन 'भारती' समय कहता है अहिंसा परमं मित्रमहिंसा परमं सुखम्।। मैं वह आईना हूँ जो देखूगा वह दिखाऊँगा, सर्वयज्ञेषु वा दानं सर्वतीर्थेषु वाड.प्लुतम्। फरेब देने का मुझे हुनर नहीं आता ।। सर्वदान फलं वापि नैतन्तुल्यमहिंसया॥" 2 सामाजिक परिदृश्य में समय ने जिसे देखा वह हिंसा अर्थात् अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा परम तप है। और अहिंसा का चित्रण था। जहाँ अहिंसा चुक जाती है अहिंसा परम सत्य है जिससे धर्म प्रवर्तित होता है। अहिंसा वहाँ हिंसा अपना प्रभाव दिखलाती है और जहाँ हिंसा परम धर्म है, अहिंसा परम दम (इन्द्रियजय) है। अहिंसा अपने चरम पर पहुँच जाती है वहीं से अहिंसा की चाह परम दान है, अहिंसा परम तप है। अहिंसा परम यज्ञ है, प्रारम्भ होती है। "सबसे ऊँचा आदर्श जिसकी कल्पना अहिंसा परम फल है। अहिंसा परम मित्र है, अहिंसा परम मानव मस्तिष्क कर सकता है, अहिंसा है। अहिंसा के सुख है। सभी यज्ञों, सभी दानों, सभी तीर्थों, सभी दानसिद्धांत का जितना व्यवहार किया जायेगा, उतनी ही मात्रा फलों में भी अहिंसा के समान और कोई नहीं है। आचार्य सुख और शान्ति की विश्वमण्डल में होगी।" 1 नीति समन्तभद्र ने अहिंसा को संपूर्ण संसार के प्राणियों के लिए कहती है परम ब्रह्म बताया है- "अहिंसा भूतानां जगतिविदितं ब्रह्म "whoever places in mans path a share, Himself will in the sequel stamble there. Joy's आचार्य सोमदेव कहते हैंfruit up on the branch of kindness grows. Who यस्यात्प्रमादयोगेन प्राणिषुप्राणहायनम्। sows the bramble, will not pluck the rose." अर्थात् जो दूसरों के मार्ग में जाल बिछाता है, वह सा हिंसा रक्षणं तेषामहिंसा तु सतां मता॥ स्वयं उसमें गिरेगा। करुणा की शाखा में आनंद के फल ___ अर्थात् असावधानी अथवा राग-द्वेष आदि के अधीन लगते हैं। जो काँटा बोता है वह गुलाब को नहीं पायेगा। होकर जो जीवधारियों का प्राण हरण किया जाता है, वह यहाँ तक कह दिया गया कि हिंसा है। उन जीवों का रक्षण करना अहिंसा है। संसार में जो तोको काँटा बुबै, ताहि बोय तू फूल। अहिंसा की महत्ता को सभी धर्म स्वीकार करते हैं। तोहि फूल के फूल हैं, वाको हैं तिरसूल॥ कबीर भगवान महावीर की देशना है किकुछ लेकर बदले में देना व्यापार है और देने की एयं ख नाणिणो सारं जं न हिंसइ कंचण। शक्ति होने पर बिना याचना के देना दान है. धर्म है। अहिंसासमयं चेव एतावंते वियाणिया॥ सद्गृहस्थ इसी धर्म का अवलंबन लेता है। 'नजमी सव्वे जीवा वि इच्छंति, जीविउं न मरिजिउं। सिकन्दराबादी' ठीक ही कहते हैं कि तम्हा पाणवहं घोरं णिग्गंथा वज्जयंति णं॥ मैंने क्या पाया है दुनियां से कभी सोचा नहीं। अर्थात् मनुष्य के ज्ञानी होने का सार यह है कि वह सोचता ये हूँ कि मैं दुनिया को क्या दे जाऊँगा॥ | किसी भी प्राणी की हिंसा न करे। अहिंसामूलक समता ही जिसकी भावना दान की है, परोपकार की है, समता की धर्म है, अहिंसा का विज्ञान भी यही है। सभी प्राणी जीवित है, समाज की है, वे हिंसा से दूर रहकर अहिंसा की भावना रहना चाहते हैं, मरना कोई नहीं चाहता। प्राणवध को घोर रखते हैं और उसी का परिपालन करते हैं। महाभारत के (पाप) समझकर निर्ग्रन्थ उसका वर्जन करते हैं। अनुशासन पर्व में अहिंसा की महिमा इस रूप में गायी है कुछ लोगों का मत है कि हिंसा अपरिहार्य है। उसके कि बिना समाज और संसार का काम नहीं चल सकता। यहाँ अहिंसा परमोधर्मस्तथाहिंसा परं तपः। तक कि वे यह भी कहते हैं कि यदि समाज में हिंसा नहीं अहिंसा परम सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते॥ होती तो अहिंसा के महत्व का प्रतिपादन ही नहीं हो पाता। अहिंसा परमोधर्मस्तथा हिंसा परो दमः। हिंसा और अहिंसा दोनों साथ-साथ चलते हैं, ऐसा मानने अहिंसा परमं दानमहिंसा परमं तपः॥ वाले 'कीनेथ गोर्डन' का हिंसा के बारे में कथन है किअहिंसा परमो यज्ञस्तथाहिंसा परम् फलम्। 16 जनवरी 2005 जिनभाषित Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524293
Book TitleJinabhashita 2005 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2005
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size5 MB
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