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________________ कर्मसिद्धान्त-व्यवस्था से वेदवैषम्य की सिद्धि वेदवैषम्य जैनदर्शन का विचित्र प्रतीत होने वाला, किन्तु । बतलायी गई है। इसलिए षट्खण्डागम में मनुष्यनी के लिए वास्तविक, विशिष्ट सिद्धान्त है । यह दिगम्बर और श्वेताम्बर संयतगुणस्थान के विधान से द्रव्यस्त्री की मुक्ति का विधान दोनों परम्पराओं के आगमों में स्वीकृत है। स्त्रीशरीर के सूचक सिद्ध नहीं होता । योनि - स्तन आदि चिह्नों, पुरुष शरीर के सूचक शिश्न आदि चिह्नों और नपुंसक शरीर के सूचक योनि- शिश्न आदि के अभाव को द्रव्यवेद या द्रव्यलिंग कहते हैं । तथा पुरुष के प्रति कामभाव, स्त्री के प्रति कामभाव और दोनों के प्रति कामभाव का नाम भाववेद या भावलिंग है। देवों, नारकियों, भोगभूमिजों तथा कर्मभूमि के मनुष्यों और संज्ञी तिर्यंचों में द्रव्यवेद और भाववेद समान ही होते हैं । अर्थात् जो द्रव्य या शरीर से स्त्री, पुरुष या नपुसंक है, वह भाव से भी स्त्री, पुरुष या नपुंसक ही होता है, किन्तु कर्मभूमि के संज्ञी तिर्यंचों और मनुष्यों में व्यवस्था कुछ भिन्न है। उनमें भी प्राय: दोनों वेद समान ही होते है, मात्र कुछ जीवों में विषम हो जाते हैं। जैसे किसी मनुष्य में स्त्रीवेद नामक नोकषायवेदनीय कर्म के उदय से भाववेद तो स्त्री का उदित होता है, किन्तु शिश्नादि - उपांगनामकर्म के उदय से उसके शरीर की रचना पुरुषाकार हो जाती है। इसके फलस्वरूप शरीर से पुरुष होते हुए भी उसकी प्रवृत्तियाँ पुरुषसदृश न होकर स्त्रीसदृश होती हैं, उसमें पुरुष के ही साथ रमण करने की इच्छा उत्पन्न होती है। इसी प्रकार किसी मनुष्य में पुंवेदनामक नोकषायवेदनीय कर्म के उदय से भाववेद तो पुरुष का प्रकट होता है, किन्तु योनिस्तनादि - उपांगनामकर्म के उदय से उसके शरीर की आकृति स्त्रीरूप हो जाती है। इस तरह तीनों भाववेदों और तीनों द्रव्यवेदों में परस्पर विषमता होने से वेदवैषम्य के नौ विकल्प होते हैं। भाववेद कषाय होते हुए भी कषाय के समान अन्तर्मुहूर्त में परिवर्तित नहीं होता, अपितु जन्म से लेकर मृत्यु तक स्थायी रहता है । भाववेद मोक्ष में बाधक नहीं है। यदि कोई मनुष्य भाव की अपेक्षा स्त्रीवेदी या नपुंसकवेदी है, तो मोक्षप्राप्ति में कोई बाधा नहीं होती। किन्तु यदि द्रव्य (शरीर) की अपेक्षा स्त्रीवेदी या नपुंसकवेदी है, तो मोक्षसाधना असंभव हो जाती है । अतः द्रव्यवेद भाववेद से बलवान् है। फलस्वरूप मनुष्यादि गतियों का प्रशस्त, अप्रशस्त और अप्रशस्ततर स्वरूप उसी के द्वारा निर्धारित होता है । 'षट्खण्डागम' में मनुष्यगति के भावस्त्रीवेदी द्रव्यपुरुष को भी 'मनुष्यिनी' शब्द से अभिहित किया गया है और इस प्रकार की मनुष्यिनी के लिए चौदह गुणस्थानों की प्राप्ति संभव 12 जुलाई 2004 जिनभाषित Jain Education International प्रो. रतनचन्द्र जैन भाववेद के अनुसार द्रव्यवेद की रचना का मत आगमविरुद्ध किन्तु प्रो. हीरालाल जी जैन वेदवैषम्य को स्वीकार नहीं करते, इसलिए उन्होंने षट्खण्डागम में जिस मनुष्यनी के लिए संयत गुणस्थान की प्राप्ति बतलायी है, उसे भावमनुष्यिनी न मानकर द्रव्यमनुष्यिनी माना है और यह सिद्ध करने की चेष्टा की है कि दिगम्बर जैन परम्परा में भी स्त्रीमुक्ति मानी गयी है। (सिद्धांतसमीक्षा, भाग 3, पृष्ठ 191, हिन्दी ग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय, बम्बई, सन् 1945 ) । उन्होंने यह भी प्रतिपादित करने का प्रयत्न किया है कि कर्मसिद्धान्त व्यवस्था से वेदवैषम्य सिद्ध नहीं होता (वही, पृष्ठ 191 ) । वे गोम्मटसार जीवकाण्ड 271 वीं गाथा श्री केशव वर्णी कृत जीवतत्त्व प्रदीपिका काका प्रमाण देते हुए लिखते हैं "मैंने (पं. राजेन्द्रकुमार जी को) उसी गाथा की संस्कृत टीका पढ़कर सुनाई, जहाँ विधिवत् यह बतलाया गया है कि जब पुंवेद के उदय के साथ निर्माण और अंगोपांगनामकर्म का उदय होता है, तभी शिश्नादि - लिंगाकित पुरुषशरीर उत्पन्न होता है । जब स्त्रीवेद के उदय के साथ उन्हीं नामकर्मों का उदय होता है, तब योनि आदि लिंगसहित स्त्रीशरीर उत्पन्न होता है और जब नपुंसकवेदोदय के साथ उन्हीं कर्मों का उदय होता है, तब उभयलिंग-व्यतिरिक्त नपुंसक शरीर उत्पन्न होता है । यही कर्मसिद्धान्त की नियत व्यवस्था बतलाकर टीकाकार क्वचित् विषमत्व की बात यह कहकर समझाई है कि चूँकि परमागम में तीनों वेदों से क्षपक श्रेणी का विधान किया गया है, इसलिए यह भी संभव मान लेना चाहिए कि कर्मभूमि के जीवों में भाव और द्रव्य वेदों में वैषम्य भी होता है । किन्तु टीकाकार ने वेदसाम्य को जैसी व्यवस्था से समझाकर बतलाया है, वैसी वे यहाँ नहीं बता सके कि कर्मोदय की कौन सी व्यवस्था से यह केदवैषम्यं फलित होता है । वेदवैषम्य इस कारण भी स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि यदि किसी भी द्रव्य शरीर के साथ कोई भी भाववेद उदय में आ सकता, तो जीवन में कषायों के समान वेदपरिवर्तन भी माना गया होता । आगम में वेद परिवर्तन नहीं मानने का कारण यही है कि स्त्रीवेद स्त्रीशरीर में ही उदय में आ सकता है और चूँकि For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524287
Book TitleJinabhashita 2004 07
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2004
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size5 MB
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