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________________ आदर्श त्यागी बनें आचार्य श्री विद्यासागर जी प्रवचन, चातुर्मास स्थल : गोम्मटगिरी, इन्दौर, दीपावली : निर्वाण लड्डू, सोमवार, ८ नवम्बर १९९९ । आज महावीर भगवान के निर्वाण को २५०० वर्ष पूर्ण हो गये हैं। अब तक जो श्रमण परम्परा चली है, वह उसी वीतराग परम्परा का प्रतीक है। यद्यपि महावीर भगवान् हमारे बीच नहीं हैं किन्तु उन्होंने आत्मा के स्वरुप को प्राप्त करने के लिये जो साधना अपनाई और उस साधना के जो चिन्ह विद्यमान हैं, उन्हें वे हमारे पास छोड़कर चले गये हैं। आज दुनिया में जो रास्ता बनाता है और आगे बढ़ता है उसे वह स्वयं समेट कर ले जाता है, क्योंकि उसे उसने बनाया था। जैसे भवनों में लिफ्ट ऊपर चढ़ती है, तो अपना चिन्ह नहीं छोड़ती। वेसे ही महावीर भगवान् भी अपने साथ कुछ भी लेकर नहीं गये । अपना जो कुछ था उसे रख लिया। बाकी को यहाँ यथावत् ज्यों का त्यों छोड़कर चले गये। विचार आता है। सबसे ज्यादा फोन करने वाले आज त्यागी हो गये हैं। ये कौन हैं ? किस आधार पर इनके फोन चलते हैं ? इनकी कोई बिजली की दुकान या मकान है। किसलिये इनको इसकी (फोन की) क्या आवश्यकता है ? ये सब बातें मैं इसलिये कह रहा हूँ, त्यागी को कह सकता हूँ, गृहस्थों को नहीं। मेरे पास त्यागी एक नहीं बहुत सारे हैं। इसलिये इन्हें अपनी मर्यादा कायम रखना अनिवार्य है। ब्रह्मचारियों के लिये मेरा कहना है वे अपनी सीमा में रहकर के ही निष्परिग्रहता का परिचय देते हुए समाज को परिग्रह से उबारने का ही प्रयास करते रहें। समाज में किसी प्रकार का पक्षपात, क्षोभ और शैथिल्य न हो। 'सादा जीवन उच्च विचार' वाली बात आना चाहिए। ब्रह्मचारियों से आज मेरा विशेष रूप से कहना है कि वे अपनी सादगी को भूलें नहीं । वैराग्य को भूलें नहीं। अपने पहनावे में परिवर्तन न लावें। गाँधी जी जैसे सादगी से घुटने तक पहनकर रहते थे, उसी प्रकार पहना करें। सादगी इसी में है। लोग कहते हैं कि महाराज ! आप किसी को कुछ कहते नहीं । मैं कहता हूँ, बात आपको पता नहीं है। इसीलिये आज कह रहा हूँ कि आप मर्यादा कायम रखें। त्यागी मर्यादा भंग करता है, तो गृहस्थ उससे भी ज्यादा करता है क्योंकि उसकी कोई मर्यादा होती ही नहीं है। संयम की रेखा तो हमारी रहती है। त्यागी किसी भी प्रकार से अपनी आत्म गौरव, मूल्य व सीमा नहीं | खोएँ । समाज को कुछ देना चाहते हैं, तो यही मार्ग सही है । गुरुवर ज्ञानसागर जी ने मुझसे कहा था कि यदि ब्रह्मचारी एकदो प्रतिमा वाला भी हो, तो समाज को हिला सकता है। पूरा समाज उसकी ओर आकृष्ट हो सकता है । चाहिए उसके पास सादगी। दो प्रतिमाधारी भी समाज में बहुत काम करके गये हैं। अगर आगे की प्रतिमाएँ ले लें, किन्तु सादगी नहीं रखें, पैसे और लोभ-लालच के साथ रहें, मोटर गाड़ी के साथ आना-जाना हो, तो गड़बड़ है। आज तो सबसे ज्यादा मोटर गाड़ियों का उपयोग होने लगा है। सादगी की दृष्टि से आरम्भ त्याग प्रतिमा है । हु अनिवार्य हो, तो वाहन में बैठो। आज वाहन तो क्या रेल में, बस में भी कोई नहीं जाता। ए.सी. (एयर कण्डीशन) कार चाहिए। उसमें ब्रह्मचारियों की यात्रा होती है। यह सुन जानकर मुझे बहुत Jain Education International आप कह सकते हैं कि महाराज! आपको आज क्या हो गया है ? हमने बहुत सी बातें कानों से सुनी और आँखों से देखी भी हैं। इसलिये कह रहा हूँ । गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज ने कहा था- 'देखो, ऐसे वस्त्र पहनना चाहिए, जिनमें से भीतरी अंग नहीं दिखे।' हाँ, बिल्कुल इसीप्रकार के वस्त्र ब्रह्मचारियों, ब्रह्मचारिणियों को पहनना चाहिए। उनमें टिनोपॉल, रानीपॉल वगैरह कभी भी नहीं लगाना चाहिए । निर्वाण लड्डू चढ़ाते समय आप लोग (ब्रह्मचारीगण ) संकल्प लीजिये। नहीं लेंगे, हम आप लोगों से बातें नहीं करेंगे। बिल्कुल (संकल्प लीजिये) इसमें क्या बात हो गयी ? हमारे निर्देशन का पालन करो, करके दिखाओ। बिल्कुल मैं ऐसा ही करता था महाराज (ज्ञानसागरजी ) प्रसन्न होते थे। मैं कहता था- 'महाराज ! मुझे तो जल्दी-जल्दी (वस्त्र) उतारना है। इनको क्या पहनना ?' इन्हें अंग ढकने व मर्यादा रखने के लिये पहनना चाहिए। इनमें कोई आकर्षण नहीं, सादगी होना चाहिए। दुनिया रागी है और आप वैराग्य पथ के उपासक हो । गाँधीजी गृहस्थ आश्रम में रहते हुए साधु जैसे रहते थे। आज के त्यागियों को देखकर के ऐसा लगता है जैसे कोई रईस आ रहा हो। ऐसा क्यों है ? वस्त्र स्वच्छ, साफ, निश्छिद्र रखिये ।। इसमें कोई बाधा नहीं है। मान लो वस्त्र फटने को हों, तो उसे पहले ही छोड़ दीजिये । इस व्यवस्था के लिये पहले से गृहस्थ लोग तैयार हैं। उनके पास दुकानें हैं, कपड़ों की कोई कमी नहीं है। लेकिन कपड़े कोई शोभा नहीं है । आप कितनी वीतरागता के उपासक हैं ? महावीर भगवान को लड्डू चढ़ाने का यही एकमात्र फल है। हम वीतरागता का मूल्यांकन करें। राग की ओर न जायें। गृहस्थ का राग समाप्त हो, इस प्रकार की प्रक्रिया करें। कल चातुर्मास समाप्त हो गया। मैं महावीर भगवान् से प्रार्थना करता हूँ- 'हे भगवन् ! जैन-धर्म जो विश्व धर्म के रूप में है, उसकी प्रभावना में हमारा मन, वचन, काय लगा रहे और जो कोई भी व्यक्ति हैं उनके लिए भी मेरा यही कहना है ।' * For Private & Personal Use Only प्रस्तुति: निर्मल कुमार पाटोदी २२, जाय बिल्डर्स कॉलोनी, इन्दौर (म. प्र. ) ४५२००३ www.jainelibrary.org
SR No.524283
Book TitleJinabhashita 2004 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2004
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size4 MB
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