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________________ श्रमणाचार में एकलविहार का निषेध डॉ. श्रेयांस कुमार जैन श्रमण परम्परा में श्रमण (साधु) जीवन को सर्वश्रेष्ठ माना आत्मना पञ्चमः श्रेयान् चतुर्भिस्त्रिभिरेव च। है। श्रमण के हृदय में लोकहित की भव्य-भावना सतत रहती है समं गच्छन् यतिर्गच्छ गणनीयो न चापरः।। किन्तु वह लोकहित के नाम पर अपना आध्यात्मिक विकास कभी नीतिसारग ५५ भी अवरूद्ध नहीं करता है। लोकहित और आत्महित इन दोनों में संघ में चलता हुआ अपने साथ-साथ पांच अथवा चार या से प्राथमिकता किसे दी जाये यह प्रश्न समुत्पन्न होने पर वह पहले तीन साधुओं को लेकर विहार करें यही साधु के लिये श्रेष्ठ है । साधु आत्महित को प्राथमिकता देता है। यही कारण है कि आचार्य श्री | के एकल विहार करने से जो भयंकर हानियाँ होती हैं उन्हीं को कुन्दकुन्द स्वामी ने श्रमण को परहित की अपेक्षा आत्महित करने बताते हुए साधुओं की आचारसंहिता मूलाचार के समाचार विधि की बात कही है अधिकार में कहा हैआदहिदं कादव्वं जं सक्कड़ परहिदं च कादव्वं । गुरु परिवादो सुदवुच्छेदोतित्थस्स मइलणा जडदा। आदहिदपरहिदादो आदहिदं सुटठु कादव्वा॥ भिंभल कुसीलपासत्थदायउस्सारकप्पम्हिाला॥१५१॥ आत्महित करना चाहिए जितना शक्य हो परहित भी करना एकल विहार करने पर गुरु की निन्दा होती है, श्रुत का चाहिए आत्महित और परहित में आत्महित विशेष रूप से करना विच्छेद होता है। जिनशासन में मलिनता आती है, जड़ता, व्याकुलता, चाहिए। कुशीलपना, पार्श्वस्थता आती है। वह जहाँ भी जाता है, वहाँ आत्महितेच्छु श्रमण जिनेन्द्र आज्ञा को अक्षरशः स्वीकार कलह, विसंवाद आदि अशांति के कारण उपस्थित कर देता है। इस करता है जिनेन्द्र भगवान ने श्रमणाचार वर्णन में पञ्चमकाल के विषय में आचार्य सकलकीर्ति का कहना हैश्रमण (साधु) को अकेले विहार करने का निषेध किया है। जिनेन्द्र स्वेच्छावासविहारादिकृतामेकाकिनां भुवि। प्रभु की दिव्यध्वनि के आश्रय से आरातीय आचार्यों ने शास्त्रों की हीयन्ते सद्गुणानित्यं बर्द्धन्ते दोषकोटयः।। मूलाचार प्र. २२२४ रचना की है उन्हीं शास्त्रों के आधार पर एकल विहार के सम्बन्ध जो मुनि अकेले ही अपनी इच्छानुसार चाहे जहाँ निवास में लिखा जा रहा है करते हैं, चाहे जहाँ विहार करते हैं, उनके सभी सद्गुण नष्ट हो जाते सच्छंगदागदीसयण णिसयणभिक्खवोसरणो। हैं और करोड़ों दोष प्रतिदिन बढ़ते रहते हैं। सच्छंदजंपरोचि य मा सत्तू वि एगागी॥ एकल विहारी स्वच्छन्दवृत्ति हो जाते हैं, उनका लौकैषणा (मूलाचार समा. १५०) जो साधु शयन, आसन, आदान, भिक्षा और व्युत्सर्ग (मलमूत्र में पड़ जाना स्वाभाविक है। ख्याति के लिये जो कार्य साधु को का त्याग) करते समय स्वच्छन्द गमनागमन करता है तथा जिसकी कभी नहीं करना चाहिए, वह कार्य प्रायः अकेले विहार करनेवालों रूचि स्वेच्छापूर्वक भाषण करने की रहती है, ऐसा साधु मेरा शत्रु में देखने को मिल रहे हैं। अकेले विहार करने वाले द्वारा गुर्वाज्ञा भी हो तो भी अकेला विचरण न करे। यह पञ्चम काल मिथ्यादृष्टियों का उल्लंघन होता है। ज्ञान के प्रति अविनय होती है। ज्ञानावरण कर्म और दुष्टों से भरा हुआ है तथा इस काल में जो मुनि होते हैं, वे हीन का विशेष आस्रव करता है। अपनी समाधि और सम्यग्दर्शन का संहनन को धारण करने वाले शक्तिहीन और चंचल स्वभाव वाले नाश करता है, गुरु शिष्य में कलह उत्पन्न करता है। अनेक होते हैं। इन मुनियों को पंचम काल में दो, तीन, चार आदि की । रोगादिक ग्रस्त होकर इष्टवियोग जन्य दुःख को सहन करना पड़ता संख्या के समुदाय से ही निवास करना, समुदाय से विहार करना है इसलिए वर्तमान के साधकों में एकल साधना को न स्वीकार कर और समुदाय से ही कायोत्सर्ग आदि करना कल्याणकारी है। | सामूहिक साधना को महत्त्व दिया गया है। अपरिग्रह, दया तथा एकांकी विहार करने वालों के व्रतादिक स्वप्न में भी कभी निर्विघ्र करुणा और मैत्री की साधना संघीय परम्परा में ही पुष्पित और नहीं पल सकते, उनके मन की शुद्धि भी नहीं हो सकती और उनकी | पल्लवित होती है। दीक्षा कभी निष्कलंक नहीं रह सकती है। इन सब बातों को | तीर्थङ्कर परमदेव की इस आज्ञा का उल्लंघन कर जो अकेले समझकर मुनियों को अपने विहार, निवास व योग धारण आदि विहार व निवास आदि करते हैं, सम्यग्दर्शन से रहित समझना समस्त कार्य निर्विघ्न पूर्ण करने के लिए तथा उनके शुद्ध रखने के | चाहिए। एकलविहारी मुनियों के सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र नष्ट हो लिए संघ के साथ ही विहार आदि समस्त कार्य करने चाहिए, जाते हैं । इस लोक में उनका कलंक दुस्त्याज्य हो जाता है और पदअकेले नहीं। जैसा कि कहा गया है पद पर उनका अपमान होता है। भगवान् सर्वज्ञ देव की आज्ञा का उल्लंघन करने रूप महापाप 8 नवम्बर 2003 जिनभाषित - Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524279
Book TitleJinabhashita 2003 11
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2003
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size5 MB
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