________________
जाता है, यह व्रत निजानुभव का हेतु है जिसकी दृष्टि इस व्रत की है और सतत भावना इसको प्राप्त करने की होती है, वही व्रत को प्राप्त कर सकता है। ममकार और अहंकार को छोड़कर जो अपने आप को देखता है, वही इस दीक्षा को ले सकता है या यह कहें ममकार और अहंकार को छोड़ने का नाम है दीक्षा, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। अभी किसी ने कहा कि सारभूत प्रवचन करें गे। तो हमें समझना है, सारभूत क्या है? तो असारभूत को छोड़ देना ही सारभूत बात है। अब देखना क्या है? सारभूत तत्त्व को देखना है, यह संसार तो असारभूत है। क्योंकि कहा गया है
"जो संसार विषै सुख होता, तीर्थंकर क्यों त्यागे"
इस संसार को असारमय समझकर वृषभनाथ भगवान सब छोड़ कर वन चले गये। हम तीर्थंकर के बारे में सोचें। एक कथन है कि तीर्थंकर भगवान को जन्म से अवधिज्ञान होता है, लेकिन वह अवधिज्ञान देशावधिज्ञान होता है। लेकिन जैसे दीक्षा लेते हैं वह ज्ञान परमावधि के रूप में हो जाता है। आज के इस प्रसंग से हमें समझना है कि आखिर कब तक राग के थपेड़े सहन करते रहोगे, वीतरागमय अपने जीवन को बनाने का प्रयास करना अनिवार्य है। सार तो केवल आत्मा के वैभव को पाने में हैं, बाकी सब निस्सार है, जिसने इसको समझ
श्री अ. भा. दि. जैन विद्वत्परिषद् द्वारा प्रतिवर्ष प्रदान किये जाने वाले पुरस्कारों हेतु विद्वानों से प्रस्ताव आमन्त्रित किये जाते हैं। ये पुरस्कार हैं
१. पूज्य क्षु. गणेश प्रसाद 'वर्णी' पुरस्कार (राशि 5101 रुपये)
( जैन धर्म की प्रभावना एवं समग्र रचनात्मक योगदान के लिये)
२. गुरुवर्य पं. गोपालदास वरैया पुरस्कार ( राशि 5101 रुपये)
( उत्कृष्ट शोधकृति के लिए) विशेष सूचना :
• प्रथम पुरस्कार हेतु सम्पूर्ण विवरण के साथ कृतित्व को दर्शाने वाली कोई चार पुस्तकें भिजवाना अनिवार्य है।
लिया उसने ही समयसार के सार को पा लिया। हमने आज तक अपने आपके वैभव को नहीं जाना, इसलिये संसार की असारता से हम अनभिज्ञ हैं। हम तो भगवान के सामने यही सोचते हैं- हे प्रभु! हमारे ऊपर वह कृपा कब होगी जिस समय हम भी आपकी तरह अपने वैभव को पा सकेंगे। हम इस संसार के आकर्षण से बहुत दूर |हो जायें। अब आप लोगों को रागरंग से ऊपर उठने का प्रयास करना चाहिए। यह संसारी प्राणी आज तक यह समझ नहीं पाया, इसलिए इस लोक में इसका नाच आज भी जारी है। इसीलिए तो कहा है यह संसार कैसा है? तो कहा जाता है
विद्वत्परिषद् - पुरस्कारों के लिए प्रस्ताव आमन्त्रित
● द्वितीय पुरस्कार हेतु अपनी शोधकृति की चार प्रतियाँ भिजवाना अनिवार्य है।
पुरस्कारों हेतु प्रस्तावक अथवा लेखक के लिए 'विद्वत् परिषद्' का सदस्य होना अनिवार्य नहीं है। पुरस्कारों की संख्या में वृद्धि संभावित है। पुरस्कारों का निर्णय एक उत्कृष्ट चयन समिति के द्वारा किया जायेगा, जिसका निर्णय सर्वमान्य होगा। पुरस्कार हेतु प्रस्ताव भेजने की अंतिम तिथि 30 मार्च, 2002 है।
पूर्व पुरस्कृत कृतियाँ भी प्रस्तावित की जा सकती हैं।
Jain Education International
"जीव अरु पुद्गल नाचे यामें कर्म उपाधि है"
इस संसार में जीव और पुद्गल दो ही कारण हैं जिनके कारण संसार में यह जीव नाच रहा है। जिसे सम्यग्ज्ञान हो गया है, वह इस संसार के राग में न फँसकर वैराग्य को धारण करता है, उसे कोई नहीं रोक सकता है। वह तो अपने कदमों को कल्याण के मार्ग पर बढ़ाता है। आप लोग भी अपना कल्याण करें, इस भावना के साथ विराम लेता हूँ। अहिंसा परमो धर्म की जय।
प्रस्तुति: मुनि श्री अजितसागर जी
● प्रस्ताव हेतु आने वाली कृतियाँ वापिस नहीं की जायें गी। सभी कृतियों को 'मुनि श्री सुधासागर शोध ग्रन्थालय, बुरहानपुर (म.प्र.) में सुरक्षित रखा जायेगा। कृपाया पुरस्कार हेतु प्रस्ताव निम्नलिखित पते पर भिजवाएँ
- डॉ. सुरेन्द्र कुमार जैन 'भारती' मंत्री - श्री अ.भा. दि. जैन विद्वत् परिषद्,
एल 65, न्यू इन्दिरा नगर, ए, बुरहानपुर (म.प्र.) पिन 450 331
ककरवाहा में विद्वत्समागम
-
For Private & Personal Use Only
ककरवाहा (टीकमगढ़) में 10 दिवसीय श्री कल्पद्रुम महामण्डल विधान विश्वकल्याण कामना महायज्ञ गजरथ महोत्सव विविध धार्मिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ सम्पन्न हुए। जिसमें प्रमुख रूप से पं. वल्देव प्रसाद कारीटोरन का सम्मान पं. दयाचन्द्र शास्त्री अजयगढ़ का अमृतमहोत्सव तथा प्रतिष्ठाचार्य पं. गुलाब चन्द्र जी 'पुष्प' का शिखर सम्मान आयोजित किया गया। इन कार्यक्रमों में शताधिक विद्धानों का समागम रहा। मुख्य अतिथि श्री मक्खन लालजी रोहणी दिल्ली व विशिष्ट अतिथि श्री पदमचन्द्र जी, श्री रमेश जी दिल्ली एवं पूर्णचन्द्र जी दुर्ग थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता फूलचन्द्र जी प्रेमी बनारस ने की। श्रेयांस जैन, पत्रकार ककरवाहा (टीकमगढ़) म. प्र. • मार्च 2002 जिनभाषित
5
www.jainelibrary.org