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________________ राष्ट्रपति सहस्राब्दी पुरस्कार सम्मान मेरा नहीं, बल्कि प्राकृत एवं जैनविद्या तथा जैन पाण्डुलिपियों का सम्मान है स्थान विश्व विद्यालयमा ने 30-35 वर्षा में नौकरी पा गया को याद रख सक प्रो. (डॉ.) राजाराम जैन 30 अगस्त सन् 2000 की वह तिथि मेरे जीवन | अनुशंसा करती है। की सर्वाधिक सुखद घड़ी थी जब भारत सरकार ने । कभी-कभी व्यक्ति सोचता है कि उसके कार्य-कलापों मानव संसाधन विभाग के संयुक्त शिक्षा सलाहकार डॉ. को कोई देखता नहीं। किन्तु बात ऐसी नहीं, शिक्षक पी.सी.एच. सेथुमाध्वराव का मुझे हार्दिक बधाइयों से भरा | किस-किस संस्था से जुड़ा है, किस राजनीति से जुड़ा हुआ पत्र मिला, जिसमें मुझे यह सूचना दी गई थी कि है, जिस संस्था का पदाधिकारी है, उसके मूल उद्देश्य भारत सरकार की प्रवर समिति की अनुशंसा पर भारत | क्या हैं? उससे उसका व्यक्तित्व विवादस्पद बना है के माननीय राष्ट्रपति जी ने मुझे सहस्राब्दी सम्मान से अथवा विवाद-विहीन, इन सबका लेखा-जोखा व्यक्ति के पुरस्कृत एवं सम्मानित करने का निर्णय लिया है। इसकी अनजाने में ही होता रहता है और जब किसी विशिष्ट सूचना यद्यपि सभी दैनिक समाचार पत्रों एवं समाचार सम्मान-पुरस्कार प्रदान करने के लिये सूची तैयार होने मीडिया से प्रसारित हो चुकी थी किन्तु मैं उन्हें पढ़/सुन लगती है, तब उसकी यही छवि निर्णायक मण्डल के नहीं सका था और यदि जयपुर में हमारे स्नेही मित्र प्रो. सम्मुख पूर्ण विवरण के साथ प्रस्तुत की जाती है। डॉ. प्रेमचन्द्र जी जैन (राजस्थान विश्व विद्यालय) एवं मेरा भी यही व्यक्तिगत अनुभव है। लगभग बनारस के मेरे अनन्य मित्र डॉ. फूलचन्द्र जी प्रेमी ने 30-35 वर्ष पूर्व की एक घटना है। मेरा एक छात्र टेलिफोन द्वारा तदर्थ मुझे तत्काल बधाई न दी होती, तो खुफिया-विभाग में नौकरी पा गया। हजारों की जमात सम्भवतः मैं इस सुखद समाचार से अगले कुछ सप्ताहों | में कौन सा गुरु अपने हजारों शिष्यों को याद रख सकता तक अनभिज्ञ ही बना रहता। है? मैं भी उसे भूल ही गया था। एक दिन वह मुझे कहीं भारत सरकार राष्ट्रपति-पुरस्कार हेतु चयनित | रास्ते में मिल गया। उसने आदर पूर्वक मेरे पैर छुए। फिर प्राच्य विद्याविद् विद्वानों (संस्कृत, प्राकृत/पालि अरबी एवं | उसने अपना परिचय दिया और कहा कि "मैं आपका फारसी) के नामों की घोषणा प्रतिवर्ष स्वतंत्रता दिवस गरीब शिष्य था। जीवन भर आपका अत्यन्त आभारी (15 अगस्त) के दिन करती है और चयनित विद्वानों को रहूँगा। आपने एक दिन किसी प्रसंग में अमेरिका के 16वें बधाई-पत्र प्रेषित करते हुए उन विद्वानों के कृतित्व एवं राष्ट्रपति आब्राहम लिंकन और वहीं के एक नीग्रो जाति व्यक्तित्व को उजागर करने वाले तथ्यमूलक सचित्र के महान उदार नेता बुकर टेलिफेरो वाशिंगटन तथा जीवन-वृत्त (हिन्दी एवं अंग्रेजी में) भेजने का अनुरोध बंगाल के ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की अत्यन्त गरीबी का करती है, जिससे कि उन्हें सचित्र पुस्तकाकार प्रकाशित | उदाहरण देते हुए उनकी आसमानी प्रगति की मार्मिक कर राष्ट्रपति भवन के अशोक-सभागार में पुरस्कार-सम्मान कहानी अपनी प्राकृत की कक्षा में सुनाई थी और कहा प्रदान करने के अवसर पर पुरस्कृत विद्वानों के साथ-साथ | था कि गरीब छात्रों को अपनी गरीबी को कभी भी उपस्थित केन्द्रीय मन्त्रियों, शिक्षाविदों एवं प्रतिष्ठित अभिशाप नहीं, वरदान मानकर दृढ़-संकल्प बनाना चाहिये। नागरिकों को उक्त पुस्तिका का वितरण किया जा सके। आपका यह उपदेश इतना मार्मिक था कि आज मैं उसे राष्ट्रपति पुरस्कार प्रदान करने सम्बन्धी भारत भूला नहीं और आज आपकी कृपा से मैं अच्छी सर्विस सरकार की एक उच्चस्तरीय प्रवर समिति होती है, जो पा सका हूँ। मैं खुफिया-विभाग में हूँ।" "यू.जी.सी." तथा "यूनिवर्सिटीज आफ इण्डिया" की उसका भावभरित कथन सुनकर मैं आश्चर्यचकित ईयर बुक (Year Book) में प्रकाशित भारत के सभी | रह गया। मैंने उससे पूछा कि खुफिया विभाग में हो शिक्षकों के शोध-कार्यों आदि की मौलिकता तथा अवश्य, किन्तु मैं क्या-क्या करता हूँ, उसकी भी तुम्हें विशेषताओं का अध्ययन करती है। पुनः सम्बन्धित विश्व कोई जानकारी है? कुछ बता सकते हो कि मैं कब-कब, विद्यालयों तथा महाविद्यालयों से सम्बन्धित शिक्षकों की क्या-क्या करता हूँ, और मैं उस समय विस्मित हो उठा, कार्य-प्रणालियों, शिक्षा-पद्धति, संस्था के वर्तमान संचालन | जब उसने कहा कि अन्य लोगों के साथ-साथ वह मेरे में सहयोग, छात्रों एवं शोधार्थियों के मध्य उनकी छवि विषय में भी सभी जानकारियाँ रखता है।" तात्पर्य यह, आदि की जानकारी प्राप्त करती है। पुनः खुफिया-विभाग कि व्यक्ति स्वयं ही अपने कार्य-कलापों को तो भूल तथा पुलिस विभाग से भी उनके चरित्र की गोपनीय जाता है, किन्तु खुफिया-तंत्र के खाते में सभी के रिपोर्ट प्राप्त की जाती है। सर्वांगीण जाँच-परख के बाद | कार्य-कलाप विगतवार अंकित होते रहते हैं। स्वयं सन्तुष्ट होकर यह प्रवरसमिति सर्वसम्मति से अतः किसी भी व्यक्ति को यह नहीं सोचना पुरस्कार हेतु राष्ट्रपति जी के लिए उनके नामों की | चाहिये कि उनके विवादग्रस्त या विवादविहीन कार्यों को -मार्च 2002 जिनभाषित 21 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524260
Book TitleJinabhashita 2002 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2002
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size4 MB
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