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________________ हो जाते हैं। अद्याभवत् सफलता नयनद्वयस्य, देव! त्वदीय चरणाम्बुज-वीक्षणेन। अद्य त्रिलोक-तिलक! प्रतिभासते मे, संसार-वारिधिरयं चुलकप्रमाणः।।13।। शब्दार्थ - अभवत्-हुआ,त्वदीय-आपके, चरणाम्बुज- चरणकमल, वीक्षणेन-देखने से, त्रिलोक-तिलक- हे तीन लोक के स्वामी, वारिधिः- समुद्र, चुलुक- चुल्लु, प्रतिभासते- लगता है। अर्थ - हे जिनेन्द्र देव! आपके चरण कमल देखने से आज मेरे दोनों नेत्र सफल हुए हैं। हे तीन लोक के स्वामी! आज मुझे यह संसारसमुद्र चुल्लु प्रमाण लगता है। अर्थकर्ता-व्र. महेश श्रमण संस्कृति संस्थान, सांगानेर 'तिरुक्कुरल' की सूक्तियाँ 1. 'अ' जिस प्रकार शब्द-लोक का आदि वर्ण है, ठीक उसी प्रकार आदि भगवान् (भगवान्-आदिनाथ) पुराणपुरुषों में आदिपुरष हैं। यदि तुम सर्वज्ञ परमेश्वर के श्रीचरणों की पूजा नहीं करते हो, तो तुम्हारी सारी विद्वत्ता किस काम की? 3. जो मनुष्य उस कमलगामी परमेश्वर के पवित्र चरणों की शरण लेता है, वह जगत में दीर्घजीवी होकर सुखसमृद्धि के साथ रहता है। धन्य है वह मनुष्य, जो आदिपुरुष के पादारविन्द में रत रहता है। जो न किसी से राग करता है और न घृणा, उसे कभी कोई दुःख नहीं होता। 5. देखो, जो मनुष्य प्रभु के गुणों का उत्साहपूर्वक गान करते हैं, उन्हें अपने भले-बुरे कर्मों का दुःखद फल नहीं भोगना पड़ता। जो लोग उस परम जितेन्द्रिय पुरुष के द्वारा दिखाये गये धर्ममार्ग का अनुसरण करते हैं, वे चिरंजीवी अर्थात् अजर-अमर बनेंगे। 7. केवल वे ही लोग दुःखों से बच सकते हैं, जो उस अद्वितीय पुरुष की शरण में आते हैं। 8. धन-वैभव और इन्द्रिय-सुख के तूफानी समुद्र को वे ही पार कर सकते हैं, जो उस धर्मसिन्धु मुनीश्वर के चरणों में लीन रहते हैं। जो मनुष्य अष्ट गुणों से मण्डित परब्रह्म के आगे सिर नहीं झुकाता, वह उस इन्द्रिय के समान है, जिसमें अपने गुणों (विषय) को ग्रहण करने की शक्ति नहीं है। जन्म-मरण के समुद्र को वे ही पार करते हैं, जो प्रभु के चरणों की शरण में आ जाते हैं। दूसरे लोग उसे पार नहीं कर सकते। प्रस्तुति - विनोद कुमार जैन सप्त दिवसीय शिक्षण प्रशिक्षण सम्पन्न श्री दि. जैन श्रमण संस्कृति संस्थान में 11.01.02 से 17.01.02 तक सप्त दिवसीय सर्वोदय ज्ञान प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया, जिसमें शिविर के 'निदेशक' श्रीमान् डॉ. शीतलचन्द जी प्राचार्य, 'कुलपति' श्रीमान् राजमल जी बेगस्या, ब्र. संजीव जी कटंगी, ब्र. महेश जी सतना 'प्रशिक्षक' श्री अरविन्द जी शास्त्री, "शिविर प्रभारी' श्रीमान् प्रद्युम्न जी शास्त्री ने इस शिविर को विशेष गति प्रदान की। इस शिविर में प्रशिक्षक श्री अरविन्द जी शास्त्री ने शिक्षण पद्धति की समस्याओं से अवगत कराते हुए शास्त्री कक्षा में अध्ययनरत छात्र विद्वानों को शिक्षण पद्धति का आद्योपान्त प्रशिक्षण दिया। जिसे छात्र विद्वानों ने उत्साहपूर्वक ग्रहण किया। अरविन्द जी शास्त्री ने कक्षा में उपस्थित छात्रों के समक्ष अमुक विषय को किस प्रकार प्रस्तुत करके सन्तुष्ट करना आदि शिक्षण पद्धति की शैली का प्रतिपादन करते हुए आदर्श पाठ योजना एवं आदर्श पाठ निर्देश के बारे में छात्र विद्वानों को विस्तृत प्रशिक्षण दिया। 15.01.2002 को प्रायोगिक रूप से विशेष कक्षा का आयोजन करके थोड़े विषय को एक निश्चित समय तक कैसे पढ़ायें इत्यादि प्रक्रियाओं से अवगत कराया। क्योंकि पढ़ानेवाले के समक्ष प्रथम समस्या यही होती है कि पुस्तक तो छोटी सी है और समय अधिक है तो उसे निश्चित समय तक कैसे पढ़ावें? शिविर के समापन पर पं. विनोद कुमार जी (रजवांस) ने कहा कि नीति व ज्ञान कभी बासा नहीं होता है। यह नीति और ज्ञान उपयोग के बिना पंगु है। जिस प्रकार किसी को धन का उपयोग करना नहीं आता तो उसके पास धन का होना व्यर्थ है, उसी प्रकार जिसको विद्या का उपयोग करना नहीं आता वह विद्या का सही पात्र नहीं है। अत: इस ज्ञान को उपयोग में लाना ही चाहिये। डॉ. शीतलचन्द जी ने इस विद्या को लक्ष्य करके कहा कि इसके माध्यम से छात्र विद्वान अपनी बात जन-जन तक पहुँचा पायेंगे। ब्र. महेश जी ने कहा कि ऐसे शिविरों का समय-समय पर आयोजन होते रहना चाहिये। पश्चात् डॉ. शीतलचन्द जी ने शाल ओढ़ाकर ब्र. महेश जी ने शास्त्र भेंटकर एवं पी.सी. पहाड़िया जी ने माला पहिनाकर श्री अरविन्द जी शास्त्री का सम्मान किया। अंत में छात्रावास अधीक्षक श्री प्रद्युम्न जी शास्त्री ने सभी महानुभावों का आभार व्यक्त करते हुए शिविर में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त करनेवाले प्रशिक्षणार्थियों को सम्मानित किया। संचालन संजीव जी ललितपुर ने किया। भरत कुमार बाहुबलि कुमार 'शास्त्री' श्री दि. जैन श्रमण संस्कृति संस्थान, सांगानेर, जयपुर 9. 30 फरवरी 2002 जिनभाषित Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524259
Book TitleJinabhashita 2002 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2002
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size5 MB
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