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________________ जैनहितैषी [भाग १३ अमुक महाशय मी तो सुधारके पक्षपाती हैं । करते हैं उससे अवश्य ही नवयुवक साहसी वे मी कहते हैं कि कार्य अनुचित हुआ।” सुधारकोंका उत्साह कम हो जाता है और ___ अतः सुधारके पक्षपातियोंको सोच रखना उनके कार्यमें बाधा पड़ती है। चाहिए कि ये ही लोग उनके कार्यों सबसे यहाँ प्रश्न हो सकता है कि इन लोगोंसे अधिक विघ्न डालनेवाले हैं। ये मित्र बनकर भी इतना भय करनेकी तो कोई आवश्यकता नहीं शत्रुकी सहायता करते हैं । इन्हींसे सदा सचेत देख पड़ती । सुधार ये भी चाहते हैं। केवल रहनेकी आवश्यकता है । इससे यह मतलब धीरे धीरे करना चाहते हैं। इसमें बुराई क्या है ? नहीं कि इनसे भी हम विरोध कर लें; किन्तु क्यों कि कहा है कि खरहे और कछुएकी दौडमें इनकी सलाह मानना अवश्य ही भयंकर है । धीरे धीरे चलनेवाला कछुआ ही अन्तमें जीतता है। यदि हम यह निश्चय कर लें कि इनकी सलाह किन्तु यह समझनेमें अधिक कठिनाई नहीं न मानेंगे तब इनसे अधिक हानिकी सम्भावना होगी कि इन लोगोंकी कछुएसे तुलना नहीं की नहीं, क्योंकि इनके लिए प्रकट रूपसे विरोधि- जा सकती। कछुआ तो चलनेका काम स्वयं ही योंमें मिल जाना भी अब असम्भव होगया है। करता है । वह इसमें किसीका मुँह नहीं ऊपर लिखा जा चुका है कि ये लोग ऐसा ताकता । किन्तु ये लोग उस अफीमचीकी कार्य समाजमें आदर पानेकी इच्छासे करते भाँति खुद तो कुछ करना नहीं चाहते; पथिहैं । किन्तु इससे ऐसा न समझना चाहिए कि ककी राह देखते हैं । और अपनी सुस्तीको ये हृदयसे भी सुधारके विरोधी होते हैं । मेरा उचित दिखानेके लिए दूसरोंको भी काम न अनुमान है कि अंतरंग इच्छा इनकी भी सुधा- करनेका उपदेश देते हैं । जो लोग वास्तवमें रके पक्षमें होती है। किन्तु कमी इस बातकी काम करते हैं उनके लिए कछुएका उदाहरण है कि इनमें साहस नहीं होता । अपने अभीष्ट- वास्तबमें लाभदायक है । उन्हें यह अवश्य ही की सिद्धिके लिए जो कष्ट सहना पड़ता है उचित है कि चाहे कार्य धीरे धीरे करें, किन्तु उसके लिए ये लोग तैयार नहीं हैं । इनकी मन लगाकर जब तक समाप्त न हो जाय दशा प्रायः उस अफीमची जैसी है जो बेर करते ही रहें । खरहेकी भाँति कभी बहुत जल्दखानेकी इच्छा रहने पर भी पास पड़ा हुआ 'बाजी करके कभी सर्वथा शिथिल हो बैठना वेर अपने हाथसे उठाकर मुँहमें रखनेका कष्ट किसी दशामें भी उचित नहीं कहा जा सकता। नहीं उठाना चाहता था और उधरसे जानेवाले हाँ, यदि कोई समाप्ति तक अविश्रान्त परिश्रम पथिकसे कहता था कि कृपा कर इस बेरको करते रहनेकी भी शक्ति रखता हो और कछुमेरे मुँहमें डाल दीजिए। एसे आधक वेगसे चल भी सके तो उसकी ___ इसही प्रकार सुधारकके इच्छुक होने पर भी हमें प्रशंसा ही करनी पड़ेगी। इनकी आत्मा ऐसे पथिककी खोजमें रहती है जो इसके अतिरिक्त यह भी न भूल जाना चा। कष्ट स्वयं सह ले और सफलताका आनन्द हिए कि इतिहास इसमें हमें क्या शिक्षा देता इन्हें मनाने दे। यदि इतना ही होता तो हमें है। क्या आजतक कभी कोई नई बात मनुइनकी शिकायत करनेकी आवश्यकता न होती; ध्यने ग्रहण की है जिसे किसी न किसी महापुरुकिन्तु ये लोग अपनी अकर्मण्यता और बोदे- पने कष्टं सह कर, विरोधकी पर्वाह न करके पनको छुपाने के लिए जिस मार्गका अवलम्बन स्वयं न कर डाला हो ! बड़ी बातोंको जाने दीजिए Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522836
Book TitleJain Hiteshi 1917 Ank 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1917
Total Pages98
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size12 MB
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