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जैनहितैषी
हैं उनके सिवाय दूसरी किसी भी प्रवृत्तिको मानसिक शक्तिओंको विकसित करनेके लिए पवित्र नहीं मानता है, तब ब्याह तो जैनधर्मकी उचित उपायोंकी योजना कर दे, जिससे वे दृष्टिसे पवित्र हो ही कैसे सकता है ? यदि धीरे धीरे अच्छे और सब तरहकी सुविधाओंवाधर्महीसे प्रेम है तो अखण्ड ब्रह्मचर्य धार- ले मकानोंमें रहनेकी इच्छा करने लगें और ण करो। ब्याह धार्मिक नहीं किन्तु व्या- अपनी इस इच्छाको पूर्ण करनमें समर्थ बनें। वहारिक सम्बन्ध है। भगवान् तीर्थकरोंने ब्रह्म- विवाह आदि व्यावहारिक क्रियाओंके विषयमें चर्य पालनका आदेश किया है न कि ब्याह भी ऐसा ही समझना चाहिए। धर्मदृष्टिसे विवाह, करनेका । विवाहपद्धति और विवाहके नियमों- इष्ट नहीं है; परन्तु सारे ही मनुष्योंमें ऐसी की योजना भी उन्होंने नहीं की है। आत्माका शक्ति नहीं हो सकती कि वे सिंहके समान एकाकी आनन्द ब्रह्मचर्यपालनमें, एकान्तवासमें और और आत्मसन्तुष्ट रहकर विचरण कर सकें, इस शिशिकाओं और पहाडोंमें एकाकी विचरण खयालसे समाजको 'विवाह' इष्ट मानना पडा। करते हुए आत्मचिन्तवन करनेमें है। जो इस पहले कहा जा चुका है कि विवाह ‘धर्म, एकाकी सिंहवृत्तिको धारण करनेमें, असमर्थ हैं नहीं, 'व्यवहार ' है और कोई भी व्यवहार और जिन्हें संगी सहचारीकी आवश्यकता है स्थिर या निश्चित नहीं हो सकता । इसीसे व्यवहारशास्त्र उनके लिए रचे गये हैं । व्यवहार- जुदे जुदे देशों और और जुदे जुदे समयोंके. शास्त्र-जिन मनुष्योंके लिए-जिस समयके लिए विवाहसम्बन्धी कानून जुदे जुदे रहे हैं । एक -जिस भूमिके लिए आवश्यक होते हैं, उनकी समय ऐसा था कि जब भाई बहिन एक साथ प्रकृतियों योग्यताओं और आवश्यकताओंकी जन्म लेते थे और योग्य वय प्राप्त होने पर परओर दृष्टि रखके रचे जाते हैं। सारे देशों स्परमें विवाह कर लेते थे। ऐसा भी एक समय और सारे स्वभावोंके लिए एक सा व्यवहार- था जब एक स्त्रीके अनेक पति होते थे। एक शास्त्र नहीं हो सकता, अर्थात् उन्नतिक्रमकी पतिकी हज़ारों स्त्रियोंकी कथाओंसे तो हमारे जुदी जुदी सीढ़ियोंपर खड़े हुए जीवोंके लिए शास्त्र भरे हुए हैं । हिन्दू धर्मके पुराणोंसे एक एकहीसे कानून उपयोगी नहीं हो सकते । मह- ऐसे समयका भी पता चलता है जब राजाके लका रहना चाहे जितना अच्छा हो, पर जीते जी राजमाहिषी इच्छित पुत्रकी प्राप्तिके झोपड़ोंमें रहनेवालोंके लिए यह कानून नहीं
लिए किसी ऋषिके आश्रममें कुछ कालके लिए बनाया जा सकता कि तुम अपने झोपड़ोंको
" भेज दी जाती थी ! परन्तु इन सब रूढ़ियोंमें तोड़ डालो और विना विलम्बके महल ब
- तात्कालिक स्त्रीपुरुषोंको कोई अनौचित्य, अनीति
या अधर्म नहीं मालूम होता था । इसका कारण नाओ; नहीं तो तुम्हें दण्ड दिया जायगा। यही है कि स्त्रीपुरुषका सम्बन्ध-ब्याह__ कानून बनानेवालेका लोगोंको इस बातके धर्मका अंग नहीं है
र धर्मका अंग नहीं किन्तु व्यवहारका अंग है लिए मजबूर करना तो उचित है कि तुम अपने और व्यवहारकी सृष्टि समाज स्वयं करता है, झोपडे स्वच्छ रक्खो और उनके आसपास इसलिए उसे उसमें भयंकरता, बीभत्सता या किसी तरहकी गंदगी न रहने दो जिससे कि अनौचित्य नहीं जान पड़ता। पड़ोसियोंको कुछ हानि पहुँचे । उसका यह भी समाज अपनी परिस्थितियों, आवश्यकताओं कर्तव्य है कि झोपड़ेवालोंकी आर्थिक और और खासियतोंके अनुकूल ' व्यवहार ' बनाता.
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