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________________ ठीक वैसा ही पदार्थ आ जाता है। जैसे कि हम वाईसकोपमें चीजोंको घूमते हुए देखते हैं । हम जिसे किसी वस्तुका अस्तित्व या विस्तार कहते हैं वह केवल श्रेणीबद्ध क्षणिक अस्तित्वोंका क्रम है। अब मैं इस आश्चर्यजनक सिद्धान्तको विना व्योरेवार कहे हुए जियादा समझानेका प्रयत्न करूँगा। जीव और पुद्गल । यह तो स्पष्ट है कि बौद्धोंको हर चीजकी नित्यता अस्वीकार करनी पड़ी और वे इस मुख्य विचारको इसके न्याय-सिद्ध परिणामों तक लेजानेमें असावधान न रहे । अतः उन्होंने जीव और पुद्गलका भी नित्य अस्तित्व अस्वीकार किया। वे जीवकी नित्यता पर विश्वास लाना बौद्धमतके सिद्धान्तके अत्यंत विरुद्ध समझते हैं। परन्तु इन सब बातोंमें जैनोंका ज्ञान ठीक विरुद्ध है। उनके अनुसार जीव और पुद्गल दोनों नित्य हैं और स्थायी अस्तित्व रखते हैं। यह मत उनकी दर्शन-पद्धतिका आधार है और जैनपद्धतिके मौलिक सिद्धान्तोंका खयाल दिलानेके लिए मैं अब इसे अधिक व्योरेवार बयान करूँगा। जैनोंके अनुसार मौजूद चीजोंके संसार दो वर्गोंमें विभक्त हैं; जीव और पुद्गल । इनके अतिरिक्त तीन चीजें और हैं, आकाश, धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय । परन्तु इन पर हम समय व्यय नहीं करेंगे, क्योंकि ये हमारी इस बातसे संबंध नहीं रखते । जीवोंकी संख्या अनंत है। जब तक उनको मोक्ष प्राप्त नहीं होता तब तक वे शरीरधारण. करते रहते हैं। और पुद्गल द्रव्य परमाणुओंसे बना है जो नित्य हैं । परन्तु उनकी पर्याय नित्य नहीं। पुद्गलकी पर्याय स्थिति. योंके अनुसार बदलती रहती है। पुद्गल एक ऐसी वस्तु कही जा सकती है जो चाहे जो कुछ हो सकती है। Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522798
Book TitleJain Hiteshi 1913 Ank 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1913
Total Pages66
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size7 MB
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