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________________ 3७४ જૈનધર્મ વિકાસ ॥ श्री आदिनाथ चरित्र पद्य ॥ (जैनाचार्य श्री जयसिंहसूरीजी तरफथी मळेलु.) (dis y४ ३३८ था मनुस धान. ) तवतिन चित्र सकल समझावा, पंडिताने निश्चय हो जावा । इशानकल्प श्री प्रभहीं विमाना, यहि ललित मम जीव पिछाना॥ वयंप्रभा यह सुन्दर नारी, महा सती पति आझाकारी । द्वितिय जन्म निनार्मी कहावा, अम्बर तिलक भूधर पर आवा ॥ पुनि यगंधर मुनिवर टिग आई, अनशन वृत लीना हर्षाई । द्रहधर्मा उपदेशसे, आया में तिन पास । मुज्ञ दर्शन करके तुरत, हुइ निनामी नास ।। पूर्व जन्म कर रुप सुहावा, वृत प्रभाव निनार्मी पावा। खयंप्रभा मुज मिली पियारी, इहि विधि समय गया सुखकारी॥ पुनि नंदीश्वर दीपमें, आया जिनवर द्वार। पूजन कर तीरथ चला, मार्ग चव्यन होनार ॥ रानी रही बनही असहाया, पुनि मम जीव लोहागल आवा। चीत्रमाहिं यह नारी हमारी, बिन अनुभव नहीं जानन हारी ॥ यह सुन पंडिता अति हर्षाइ, तुरत राजकन्या पहं आई। औषध सम कहदी सब बाता, सुन कुंवरी मन हो गइ साता॥ सबहिं बात पितु सन कहवाई, राजा सुन चिंता विसराई। तुरंत कुंवर बुलवाय कर, किया लग्न तत्काल । कुंवर कुवरी दानो मिले, मिटा विछोह विहाल ॥ श्रीमती वज्रजंघ सुख पाया, कर विवाह आये निज राया॥ खणे जंघ नृप मन अनुमाना, सोंप कुंवर सब राज्य खजाना । वल्न जंघ हुआ सब लायक, राज प्रजा सबहीं सुख दायक ॥ मैं दिक्षा ले जन्म सुधारूं, अष्ट कर्म कर शत्रु मारूं। इमि मन ठान बुलाय कुमारा, किन्ह महोत्सव सोपा भारा॥ पुनि दिक्षा ले त्यागी जाला, अंतिम दिन तक धर्म संभाला। वज्रसेन नृपनें उधर, किया ब्याइ सम काम। राज्य सोप निज पुत्रको, दिक्षा ली सुख धाम ॥ ...इधर हुए श्री वज्रजंघ राजा, भोग विलास करत सुख साजा ॥ .
SR No.522524
Book TitleJain Dharm Vikas Book 02 Ank 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLakshmichand Premchand Shah
PublisherBhogilal Sankalchand Sheth
Publication Year1942
Total Pages38
LanguageGujarati, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Dharm Vikas, & India
File Size9 MB
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