SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 35
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ता. १०-१०-१९६३] बुद्धिप्रभा [३३ R 7 . SAT Tod EHA जमाना बदल गया है । GULMEM00403 लेखक-कर्मयोगी श्रीमद् बुद्धिसागरसूरीश्वरजी [ “यदि मुझे शुरूमें ही पना लगना तो मैं अपना कर्मयोग कभी न लिखता। यह ग्रंथ पढ़कर मैं बड़ा खुश हुआ हूं। और मुझे संतोष है कि भारतको आप जैसे संत सअंक मिले हैं।" ऐसा लिखकर लोकमान्य बाळगंगाधर तिलकने जो प्रन्ध और प्रन्धकारका अभिवादन किया है. वही ग्रन्थकार श्रीमद् बुद्धिसागरसूरीश्वरजोके अप्रतिम प्रन्थ 'कर्मयोग'को कुछ झांखियाँ हम यहाँ हर महिना करते रहेंगे। -सं०] ___ सभी प्रकारोंके कार्य करने में जो बादि जैन राजे भी अपने क्षात्रधर्मसे पीछे कदम नहीं भरता वे सब सत्य भ्रष्ट नहीं हुये थे। कर्मयोगी हैं। पांच इन्द्रियोंके शुभाशुभ जो इन्सान झानबल, विद्यावल, भावमें अपनेको न लेपते हुये जो शरीरबल, क्षात्र धर्मबल, वैश्य कर्मबल, अनासक्त बनके स्वफरज अदा करते लक्ष्मीबद्ध, सत्ताबल, त्यागबल, अध्याहैं वे सत्य कर्मयोगी हैं। श्री महावीर. स्मबल बादि पोंकी परिपूर्ण उन्नतिस्वामीके कालमें, गृहस्थावाम में श्रेणिक ओंका संरक्षण कर सकता है वे वाकई चेटकगजा आदि सत्य कर्मयोगी थे। कर्मयोगी जानना । प्री महावीरके समयमें कोणित और जैनियों अगर उपर बताये बलों की चेडा गजवीका महायुद्ध हुआ था। संरक्षा नहीं करेंगे, और भगतीयां इनमें चेडागजा कर्मयोगी थे। उनके जैसे बनकर सभी शुभ शक्तियों का सामने देव लड़ने आये थे। फिर भी नाश करेंगे तो वे नामर्द, भीरू अपने क्षात्रधर्मके अनुसार युद्ध करने में और पूर्वकालिन कर्मयोगियोंने जो वे पीछे भागे नहीं थे। परम जैन वारसा दिया है, उनका नाश करनार वेडा महाराजाने व्यावहारिक कर्म बनेंगे। इसलिए जैनोंको फिझूल योगको खूष सफर किया था। चेटक पापभयसे और भ्रांति हतवीर्य बनना - दीपोत्सबी अंक -
SR No.522148
Book TitleBuddhiprabha 1963 10 SrNo 48
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGunvant Shah
PublisherGunvant Shah
Publication Year1963
Total Pages94
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Buddhiprabha, & India
File Size2 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy