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________________ अपभ्रंश भारती जैसी थीं। रमणीक चंचल आँखें क्रीड़ा करती मछलियाँ जैसी थीं। कुण्डल-कलित कान कमनीय थे । चम्पा के लम्बे फूल के समान नासिका - वंश मर्त्य लोक में प्रशंसनीय था । दन्तपंक्ति में मुक्कामाला की भ्रान्ति होती थी । उसके पके बिम्बफल के समान होठ लक्ष्मी को भी प्रिय थे। निरभ्र आकाश में उगे पूर्णचन्द्र के समान उसका मुखकमल था। तीन रेखाओं से मण्डित उसका कण्ठ शंख की तरह लगता था । उसके प्रचण्ड भुजदण्ड ऐरावत के शुण्डादण्ड की तरह थे । अशोक पत्र जैसे उसके हाथ इतने बलशाली थे कि उनमें वज्र को भी चूर्ण-विचूर्ण करने की शक्ति भी थी । वक्षःस्थल तो लक्ष्मी का क्रीडागार जैसा लगता था । मुष्टिग्राह्य मध्यभाग (कटिभाग) वज्रदण्ड के समान था। नाभि की गहराई अनंगरूप भुजंग की निवास-गुहा के समान थी । कामराज - पीठ जैसे उसके नितम्ब बड़े शोभाशाली थे। उसकी दोनों पुष्ट जंघाएँ अनुपम थीं। उसके मांसगूढ गुल्फ (टखने) कामराज के मन्त्री जैसे थे । कछुए जैसे पैर लम्बी-लम्बी स्वर्णिम अँगुलियों से शोभित थे । नखपंक्ति अतिशय कान्तियुक्त थी । 50 - इस अवतरण में सौन्दर्य की उदात्तता का चूडान्त निदर्शन तो हुआ ही है, कविश्री ने 'छंदओ समाणियं ति' के उल्लेख द्वारा यह निर्देश कर दिया है कि प्रस्तुत कड़वक 'समानिका' नामक वार्णिक छन्द में आबद्ध है । ज्ञातव्य है, पिंगलशास्त्र के अनुसार इस छन्द के प्रत्येक चरण में क्रमशः रगण, जगण और गुरु-लघु होते हैं 1 9-10 छन्द और अलंकार के मर्मज्ञ कवि श्री मुनि नयनन्दी के 'सुदंसणचरिउ' में इस प्रकार के अनेक उदात्त सौन्दर्य के चित्र अंकित हैं । काव्यकार ने अपने सौन्दर्य-चित्रण में आध्यात्मिक वृत्ति, गहन आन्तरिकता और इन्द्रियग्राह्य प्रकृति के चित्र को प्रभूत मूल्य प्रदान किया है। बिम्ब-विनियोग पप्फुल्लकमलवत्र्त्तं हसंति, अलिवलयघुलिय अलयइँ कहंति । दीहरझसणयणहिँ मणुहरंति, सिप्पिउडोट्ठउडहि दिहि जणंति । मोत्तियदंतावलि दरिसयंति, पडिबिंबिउ ससिदप्पणु णियंति । तडविsविसाह बाहहि णडंति, पक्खलणतिभंगिउ पायडंति । वरचक्कवाय थणहट णवंति, गंभीरणीर भमणाहिवंति । फेणोहतारहारुव्वहंति, उम्मीविसेस तिवलिउ सहंति । बिम्ब-विधान की दृष्टि से भी 'सुदंसणचरिउ' की काव्यभाषा अतिशय महत्त्वपूर्ण है । बिम्ब-विधान कलाचेता कवि की अमूर्त सहजानुभूति को इन्द्रिय ग्राह्यता प्रदान करता है। काव्यकार मुनिश्री नयनन्दी द्वारा प्रस्तुत बिम्बों के अध्ययन से उनकी प्रकृति के साथ युग की विचारधारा का भी पता चलता है। कुल मिलाकर, बिम्ब एक प्रकार का रूप - विधान है और वस्तुगत आकर्षण ही किसी काव्यकार को बिम्ब-विधान की ओर प्रेरित करता है । रूप-विधान होने के कारण ही अधिकांश बिम्ब दृश्य या चाक्षुष होते हैं । काव्यकार नयनन्दी द्वारा गंगानदी की एक नायिका के रूप में प्रस्तुति के क्रम में निर्मित रूप-रस- गन्ध-स्पर्श - शब्दमूलक पंचेन्द्रियग्राह्य बिम्बों में प्रमुख चाक्षुष बिम्ब का मनोरम विनियोग दृष्टव्य है —
SR No.521857
Book TitleApbhramsa Bharti 1997 09 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani, Gyanchandra Khinduka, Gopichand Patni
PublisherApbhramsa Sahitya Academy
Publication Year1997
Total Pages142
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Apbhramsa Bharti, & India
File Size10 MB
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