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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir भ४ १२ ] દિ ઓર “ફાગુ” કાવ્ય [ ३२५ पूर्व लेखमें जिन काव्यों का परिचय दिया गया है उनमें से निम्नोक्त ५ काम्य हमारे संग्रहकी सं. १४९३ की लिखित खरतरगच्छीय स्वाध्याय पुस्तिकामें हैं१ स्थूलीभद्र फाग, गा. २७ । २ नेमिनाथ .फाग, गा. १५, समधर । ३ भरतेश्वर चक्रवर्ती फाग गा. २०। ४ " गा. ४५,२ राजशेखरसूरि । ५ जीरावलि- पार्श्वफाग, गा. ३०, मेल्नंदन, सं १४३२ । इसके अतिरिक्त १ पुरुषोत्तम पांच पांडव फाग गा. २४ इस प्रतिमें और है एवं जैसलमेर भंडारकी अन्य एक प्रतिमें २ जिनचंद्रसूरि (जिनप्रबोधसुरि. पट्टधर) फागु मा २५ का मप त्रुटित (गा. ६ से १०) काव्य और मिला है। इन दोनोंका आदि-अंत नीचे दिया जाता है । नं. २ को पूर्ण प्रति किसी सजनको उपलब्ध हो तो हमें सूचित करने का अनुरोध है । १ पांच पांडव फागुआदि- पडु नरेसर निय कुमरु, परिणाविय साणंदु । हत्थिण'उरि पुगि आवियउ, साथि करिउ गोविंदु ॥१॥ अंत जादव पांडव कुमर हवे, ते गुणहि समिद्धा । उत्तिम धम्म पवित्त गुत्त, बिहु भुवःण प्रसिद्धा । राजकरत: धरह जगत्र रिखि तोरथ वंाउ । जा वित्थारह रिद्धिवृद्धि, पावहु चिरु नंदउ ॥२४॥ २ जिनचंद्रसरि फागुआदि- अरे पणमवि सामिउ संतिजु, सिव पाउलि उरि हारु । अरे अणहिलवाडा मंडणउ, सवह तिहुयण सारु । अरे जिणयबोहसूरि पाटिहि, सिरि संजमलिरि-कंतु । अरे गाहवउ जिणचंदसूरिगुरु, कमल देवि कउ पुत्तु ॥२॥ अंत- सिरि जिणचंइसरि फागिहि, गायहिं जे अति भावि । ते बाउल अरु पुरुसला, विलसहि लिव सुर साथि ॥२५॥ विशेष-१-पूर्वोक्त लेखमें लब्धिरचित नेमिनाथ फागुका उल्लेख है । लब्धिका पूरा नाम लब्धिकल्लोल है । उनकी आर भी अनेक रचनाओं में संक्षिप्त नाम लब्धि आया है । २-अठारहवीं शताब्दी के पूर्वाध (ख. राजहर्षरचित) के पीछेका कोई फागु काव्य नहीं मिलता । १९ वीं शताब्दी में इनके स्थान पर छोटे छोटे होरीके पदोंका प्रचार हुआ। 1 इसी प्रकार पदमरचित नेमिनाथ फागु (गा. १४) भी हमारे संग्रहकी अन्य प्रतिमें है। ... प्राचीन गुर्जर काव्य संग्रहके अनुसार इसको पत्र संख्या २५ है, पर हमारी प्रतिमें - पक्कियोंवाली १८ गाथाओंको ३६ मान कर २७+१८ गाथाभोंका अंक ४५ दिया है। . . जैन गुर्जर कविओ भा. ३, पृ. ४२२ में हमारे संग्रहको उक्त प्रतिसे उसका उद्धरण लिया है, पर एक तो वहाँ फागुफे बदले रास लिख दिया है, जब कि प्रतिमें फागु लिखा है एवं इसके अंतिम चिरुनंदउ' पाठको 'विरनंदउ' पढकर उसका कर्ता वीरनंदन लिख दिया है.. जो अफ नहीं प्रतीत होता । For Private And Personal Use Only
SR No.521624
Book TitleJain_Satyaprakash 1946 09
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJaindharm Satyaprakash Samiti - Ahmedabad
PublisherJaindharm Satyaprakash Samiti Ahmedabad
Publication Year1946
Total Pages40
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Jain Satyaprakash, & India
File Size21 MB
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