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जैन-इतिहासमें कांगड़ा
लेखक:--डा. बनारसीदासजी जैन, लाहौर (क्रमांक ११७ से शुरू : गतांकसे क्रमशः इस अंकमें सम्पूर्ण )
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नदी-नाले | उ.जयसागरकी नगरकोट-यात्रा पुरानेव्यासका अनुमानित माग संघ जानेका
सुखा भामार्ग
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भनमानित-मार्ग संघवापस आने का अनुमानित मागे बर्तमाम रेलमार्ग पर्पत-प्रदेशा
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अब अनेक पहाड़ों, नदियों और जंगलोंको पीछे छोडता हुआ संघ गोपाचलपुर३३ तीर्थमें आ पहुंचा। यहां विरिराजके बनवाये शन्तिनाथके मंदिर के दर्शन किये । पांच दिन वहां रह कर संघ विपाशा नदीके किनारे पर बसे हुए नन्दवनपुर३४ (नदौन)में आया । यहां महावीर भगवान्के भव्य मंदिरके दर्शन किये । नन्दवनपुरसे संघ कोटिल्लग्राम३५ आया और पार्श्वनाथकी यात्रा की । वहांसे कूच करके पर्वतोंके शिखरोंको लांघ कर कोठीपुर
३३. गोपाचलपुर आजकलका गुलेर है जो कांगड़ेसे आठ-दस मील दक्षिणमें है। इसका पुराना नाम ग्वालियर था, क्योंकि एक गोवालियेसे निर्दिष्ट भूमि पर इसे हरिचन्दने सं. १४६२ में बसाया था।
३४. नन्दवनपुर आज-कलका नादौन है । यह ब्यासके बायें तट पर स्थित है। कांगडेसे २० मील दक्षिणको है। गुलेर इसके रास्तेमें पड़ता है। राजा संसारचन्दको यह स्थान बड़ा प्रिय था । यहां उसने एक सुन्दर बाग लगवाया था। किसी समय यह स्थान बड़ी रौनक पर था । लोगोंमें कहावत है-आयेगा नादौन, जायेगा कौन ।
३५. कोटिल्लका आधुनिक रूप कोटला है.। इसका अर्थ है छोटा कोट या किला । इस नामके बहुतसे स्थान हैं । कभी एक. कोटलेको दूसरे कोटलेसे पृथक् करनेके लिये उसके साथ एक और शब्द जोड दिया जाता है । जैसे मालेर कोटला, कोटला पठानां ।
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