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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir जैन-इतिहासमें कांगड़ा लेखक:--डा. बनारसीदासजी जैन, लाहौर (क्रमांक ११७ से शुरू : गतांकसे क्रमशः इस अंकमें सम्पूर्ण ) CRUISION ठOOKOn नदी-नाले | उ.जयसागरकी नगरकोट-यात्रा पुरानेव्यासका अनुमानित माग संघ जानेका सुखा भामार्ग पठानकोट 004 Ent तलबाXगा भनमानित-मार्ग संघवापस आने का अनुमानित मागे बर्तमाम रेलमार्ग पर्पत-प्रदेशा रावी नदी - स्यासनदी , सप्तरुद्र ३ सर ..सप्तकट re 971 १ e -हरयाणा जालंधर A तलपारक रायविंडर सतलूजनही निश्चिन्दीपुर ++++ नुध्याना -- ---.-----42 ++++++ ++++++++++ M दीपालपर घारानदी पाकपरन अब अनेक पहाड़ों, नदियों और जंगलोंको पीछे छोडता हुआ संघ गोपाचलपुर३३ तीर्थमें आ पहुंचा। यहां विरिराजके बनवाये शन्तिनाथके मंदिर के दर्शन किये । पांच दिन वहां रह कर संघ विपाशा नदीके किनारे पर बसे हुए नन्दवनपुर३४ (नदौन)में आया । यहां महावीर भगवान्के भव्य मंदिरके दर्शन किये । नन्दवनपुरसे संघ कोटिल्लग्राम३५ आया और पार्श्वनाथकी यात्रा की । वहांसे कूच करके पर्वतोंके शिखरोंको लांघ कर कोठीपुर ३३. गोपाचलपुर आजकलका गुलेर है जो कांगड़ेसे आठ-दस मील दक्षिणमें है। इसका पुराना नाम ग्वालियर था, क्योंकि एक गोवालियेसे निर्दिष्ट भूमि पर इसे हरिचन्दने सं. १४६२ में बसाया था। ३४. नन्दवनपुर आज-कलका नादौन है । यह ब्यासके बायें तट पर स्थित है। कांगडेसे २० मील दक्षिणको है। गुलेर इसके रास्तेमें पड़ता है। राजा संसारचन्दको यह स्थान बड़ा प्रिय था । यहां उसने एक सुन्दर बाग लगवाया था। किसी समय यह स्थान बड़ी रौनक पर था । लोगोंमें कहावत है-आयेगा नादौन, जायेगा कौन । ३५. कोटिल्लका आधुनिक रूप कोटला है.। इसका अर्थ है छोटा कोट या किला । इस नामके बहुतसे स्थान हैं । कभी एक. कोटलेको दूसरे कोटलेसे पृथक् करनेके लिये उसके साथ एक और शब्द जोड दिया जाता है । जैसे मालेर कोटला, कोटला पठानां । For Private And Personal Use Only
SR No.521613
Book TitleJain_Satyaprakash 1945 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJaindharm Satyaprakash Samiti - Ahmedabad
PublisherJaindharm Satyaprakash Samiti Ahmedabad
Publication Year1945
Total Pages36
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Jain Satyaprakash, & India
File Size18 MB
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