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[१२२] શ્રી જૈન સત્ય પ્રકાશ
[१५३ ___“ज्ञात होता है कि-आठवीं शताब्दीके चतुर्थ भागके प्रारंभमें दक्षिण और उत्तर भारतमें श्वेताम्बर और दिगम्बर ग्रन्थकारोंके मध्यमें वरांगचरितकी यथेष्ट ख्याति थी। इस दिगन्त व्यापिनी ख्यातिके आधार पर यह कहा जा सकता है कि जटिल कवि अधिकसे अधिक सातवीं शताब्दीमें अवश्य हुये हैं + + + वरांगचरितकी कुछ रचनाएं समन्तभद्र (लगभग दूसरी शताब्दी) और पूज्यपाद (इ. स. ५०० के लगभग ) की रचनाओंसे साम्य रखती हैं । जहांतक मैं जानता हूं किसी भी प्राचीन संग्रहमें जटिल या जटाचार्यका नाम मुझे नहीं दीख पड़ा + + + चामुण्डरायने जटासिंहनन्दीके नामसे वरांगचरितके कर्ताका उल्लेख किया है। + + + पाश्र्वाभ्युदके रचयिता जिनसेन जैसे गुणी पुरुषके द्वारा जटाचार्यके करित्वछटाकी सराहना किया जाना कोई मामुली बात नहीं है। केवल इतना ही नहीं, किन्तु जिनसेनने अपने ग्रन्थमें वरांगचरितका उपयोग भी किया हैआदिपुराणमें वरांगचरितके कुछ प्रसंगोंको अपने शब्दोंमें लिखा है । यद्यपि आदिपुराणके प्रथम परिच्छेदको अनुष्टुप छन्दमें लिखकर उन्होंने उसका ढांचा बदल दिया है, फिर भी बहुतसे शब्द मिलते जुलते हुए हैं। उदाहरणके लिये-आदिपुराणके प्रथम परिच्छेदके १२२-२४, १२७-३०, १३९, १४३, १४४, नम्बरके श्लोकोंकी क्रमशः वरांगचरितके प्रथम परिच्छेदके ६-७, १०-११, १५, १६ और १४ नम्बरके श्लोकोंके साथ तुलना करनी चाहिये । आदिपुराण के सम्बन्धमें जो बात कही गई है । वही चामुंडराय पुराणके संबंधमें भी कही जा सकती है + + वरांग- चरित ही संस्कृतका प्रथम जैन काव्य है।
-जैनदर्शन, व. ४, अं. ६, पृ. २४२ से २५२ । अब पाठक समझ गये होंगे कि-महापुराणमें श्वेताम्बर ग्रन्थोंसे सहारा लिया है इतना ही नहीं किन्तु कुछ प्रसंग और साहित्य भी उठा लिया है।
मुझे खुशी है कि इन आचार्योंने श्वेताम्बर साहित्यका ढांचा बदलकर महापुराणका निर्माण किया, साथसाथमें इन्साफके जरिये कतिपय श्वेताम्बर मान्यताओंको भी ज्योंकी त्यों रहने दी है ।
(क्रमशः)
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