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________________ (3) देवासुर-संग्राम में कूर्म (कछुए) की पीठ का विस्तार ‘लक्ष योजन' था। (8,00,000 miles as given by the English version). (book eight, seventh discourse, stanza 9) (4) परशुराम ने जिस सहस्रार्जुन का वध किया था, उसने 85,000 (मलपंचाशीतिवषासहस्राणि) वर्षों तक राज्य किया था। (विष्णुपुराण, 4-11-18-20) (5) श्री राम ने 11,000 वर्षों तक (एकदशाब्दसहस्र) राज्य किया। (विष्णु, 4.4.99) सीता के पृथ्वीलोक में चले जाने पर श्री राम ने ब्रह्मचर्य धारण किया और 13,000 वर्षों तक अग्निहोत्र यज्ञ किया (भागवत, 9-11-18)। (6) प्रो० बलदेव उपाध्याय ने 'पुराण विमर्श' में 'वन पर्व' के 12वें अध्याय का संदर्भ देते हुए लिखा है कि अर्जुन ने कौरवों के दुष्कृत्यों से क्षुब्ध श्रीकृष्ण को यह स्मरण दिलाया कि उन्होंने पूर्व जन्म में पुष्कर में 11,000 वर्षों तक केवल जल का भक्षण कर तपस्या की थी। (पृ०43) (7) शकुंतला-पुत्र भरत ने 27,000 वर्षों तक राज्य किया। (भगवत, 9-20-32 हिंदी अनुवाद “भरत ने सत्ताईस हजार वर्षों तक समस्त दिशाओं का एकच्छत्र राज्य किया")। ___ क्या ये आंकड़े हिंदूधर्म की प्राचीनता और अद्भुतता सिद्ध करने के लिए वर्णित नहीं हैं—गढ़ नहीं लिए गए हैं? विद्वान् लेखक को पहले अपना घर भी देख लेना चाहिए। राम-कृष्ण-संबंधी साक्ष्य:—संभवत: इतिहास के विशिष्ट विद्वान् जैनों से तीर्थंकरों का पुरातात्त्विक साक्ष्य चाहते है। जैन लोग भी यह जानना चाहते हैं कि उनके पास राम, कृष्ण, शिव के वास्तविक (real) अस्तित्व के अकाट्य (incontrovertible) प्रमाण क्या हैं? ___ शायद उनका उत्तर होगा कि “रामायण, महाभारत और शिवपुराण तथा आस्था।" यदि ऐसी बात है, तो जैन भी मौखिक और लिखित परंपरा से चले आ रहे तीर्थंकर-चरित्रों के वर्णनों में विश्वास करते हैं। उनके प्रति गढ़ लिए गए' जैसे शब्दों का प्रयोग, वह भी सरकारी संस्था के माध्यम से करने का आपको क्या अधिकार है? भारत के संविधान में सबको अपने विश्वास के अनुसार अपने देवता को मानने का अधिकार या स्वतंत्रता दी गई है। न्यायालय भी किसी धर्म के माननेवालों की भावनाओं, विश्वासों को ठेस पहुँचाने की इजाजत नहीं देता। विद्वान् लेखक अधिक से अधिक यह कह सकते थे कि जैन समाज 24 तीर्थंकरों को मानता है, जिनमें प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव सबसे प्रमुख हैं। वे हिंदूपुराणों तथा बौद्ध-साहित्य में भी स्मृत हैं। अंत में तीन तीर्थंकर–अरिष्टनेमि (नेमिनाथ), पार्श्वनाथ और ऐतिहासिक प्रमाणों से सिद्ध हैं। संतुलित इतिहास-दृष्टि का एक उदाहरण प्रस्तुत है, “Almost all Tirthankaras have been subjects of many ‘Carita' books and the Puran books in Jain literature... Nobody can believe that such a number of books written with the avowed object of giving truth to the believers may have been 40 26 प्राकृतविद्या जुलाई-सितम्बर '99
SR No.521355
Book TitlePrakrit Vidya 1999 07
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRajaram Jain, Sudip Jain
PublisherKundkund Bharti Trust
Publication Year1999
Total Pages116
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Prakrit Vidya, & India
File Size10 MB
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