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________________ "महावीर सम्पत्तिभूत मन्दिरों की पाषाण-मूर्ति में बन्दी न रह सके। वे मेरे रक्त की राह, मेरी कलम पर उतर आये हैं। और अब जल्दी ही वे वैश्वानर विप्लव-पुरुष हिन्दुस्तान की धरती पर फिर से चलने वाले हैं। जीवन्त और ज्वलन्त होकर वे भारतीय राष्ट्र की शिराओं में संचरित होने वाले हैं।....स्वयं विदेह-पुत्र महावीर वैशाली के वैभव के विरुद्ध उठे हैं। अपनी ही नसों के जड़ीभूत रक्त पर उन्होंने प्रहार किया है। अपने आत्म-व्यामोह के दुर्ग में उन्होंने सुरंगें लगा दी हैं। अपने सेवक को थमा दिया। वीतराग आनन्द के स्मित के साथ मेरी ओर टुक देखा । एक अजीब अनबूझ-सी पहचान थी उन आँखों में । फिर भी केवल इतना ही कहा : 'यह परिचय-पत्र अनावश्यक था आपके लिए। · · ·कल सवेरे नौ बजे, आवास पर एकान्त में बात होगी । केवल आप होंगे, अकेले । . . . जिस युक्त पुरुष का अपने लेखन में नाना प्रकार से भावन-अनुभावन, आलेखन करता रहा हूँ, उसे देखा । जैन जगत् में अपने जाने ऐसा कोई मुनि तो पहले देखा नहीं था । यहाँ एक परम्परागत संन्यासी में से आधुनिकता-बोध को प्रसारित (रेडियेट) होते देखा। · · · रात भर एक मुस्कान मुझे हॉण्ट करती रही । कवि का अनुरागी चित्त एक साधु के प्रेम में पड़ जाने के खतरनाक तट पर व्याकुल भटक रहा था । - ‘और वह भी एक कठोर विरागी जैन श्रमण पर अनु रक्त होने की जोखिम यों एकाएक कैसे उठायी जा सकती है ? एक अजीब असमंजस में पड़ा था मेरा मन । सवेरे तैयार होकर ठीक नियत समय पर एक रमणीय उद्यान से आवेष्टित आवास के अहाते में, बन्द द्वार खटखटाने पर ही, प्रवेश मिल सका । बताया गया कि आहारबेला से पूर्व के इस अन्तराल में मुनिश्री किसी से मिलते नहीं हैं । आज केवल मैं ही इस समय का एकमात्र प्रतीक्षित अतिथि हूँ । शिलाधारों पर स्थापित कई प्राचीन जैन शिल्पों से सज्जित इस परिसर उद्यान के कलात्मक सौन्दर्य-लोक को देखकर मैं मुग्ध और चकित था । जैन जगत् में ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा था । ___ सहसा ही पाया कि एक मुस्कान मेरी राह में बिछी, मेरे पैरों को खींच रही है । · · ·आवास के बरामदे में कल सन्ध्या की वही मलय-मूर्ति सस्मित वदन मेरे स्वागत में शान्त भाव से स्थिर दीखी । चरण-स्पर्श का लोभ संवरण न कर सका । फिर भूमिष्ठ प्रणाम कर, विनम्र भाव से सामने बैट गया । '.. 'आ गये तुम ? कितने बरसों से तुम्हें खोज रहा हूँ । 'मुक्तिदूत' के रचनाकार वीरेन्द्र की मुझे तलाश रही है । पन्द्रह वर्ष तुम्हारे उस ग्रंथ को सिरहाने रखकर सोया । उसके वाक्य मेरे हृदय में गूंजते रहे । उसे पढ़कर मैंने हिन्दी सीखी। ठीक समय पर आये तुम । मुझे इस क्षण तुम्हारी जरूरत है . . .?' मुनिश्री विद्यानन्द-विशेषांक २५ Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520601
Book TitleTirthankar 1974 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichand Jain
PublisherHira Bhaiyya Prakashan Indore
Publication Year1974
Total Pages230
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Tirthankar, & India
File Size5 MB
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