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आपे फल दीइ अक्षयपणुं, नवण करंता निर्मल घणुं ।
थूइ करतां पदवी इंद्र,
जेहन पाय नमइ सुर-वृंद ||९||
नाटक - थूइ करतां जोइ,
गणधर - तीर्थंकर पद होइ ।
प्रभाति पूजइ जिनराय,
निशा तणुं तस पातक जाइ ॥१०॥ मध्य-दिवस जे पूजा करइ,
जनमतणुं पातक उपहर । संध्या पूजइ जिन आप,
सात जनमनां टालइ पाप ॥११॥ जे जिन पूजइ त्रिणि काल,
त्रीजइ भवि सिव- गति वृद्ध - बाल | उत्कृष्टा भव सात नई आठ,
ते नर लहइ मुगतिनी वाट ॥१२॥ एकवीस सतर अष्ट प्रकार,
पंचम त्रिणि भेद पणि सार ।
एणी परि जे जिन-पूजा करइ,
ऋषभदास कहइ ते नर तरइ ||१३||
॥ इति स्तवन संपूर्णम् ॥
॥ गणि रत्नविजयेन लखीतं संवत् १७०९ वर्षे श्रावण वदि १५ दिने । लिखितं बर्हाणपुरे ॥
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अनुसन्धान-७४