SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 124
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ मार्च - २०१६ ११७ इसा छई श्रीआचार्य प्रतइ माहरउ नमस्कार त्रिकाल वंदणा सदा हवउ। नमो उवज्झायाणं - माहरउ नमस्कार श्रीउपाध्याय प्रतइ हुँ । किसा ते उपाध्याय ? जे उपाध्याय द्वादशांगीसूत्र भणइ भणावइ । किसा ते द्वादशांगीसूत्र ? श्रीआचारांग १, सूयगडांग २, ठाणांग ३, समवायांग ४, विवाहपन्नत्ती ५, ज्ञाताधर्मकथा ६, उपासकदशांग ७, अंतगडदशांग ८, अणुत्तरोववाईदशांग ९, प्रश्नव्याकरण १०, श्रीविपाकसूत्र ११, श्रीदृष्टिवाद १२, ए द्वादशांगीसूत्र भणइ भणावइ । एहना साचा सूत्र-अर्थविचार कहइ । वीतरागनउ मार्ग प्रकट करइ । आपणपइ धर्मनी स्थितइं रहइ, अनेरानइ धर्मनी स्थितई राखइ । ससरीरे वि निरीहा बज्झभितरपरिग्गहविमुक्का । धम्मोवगरणनिमित्तं चरंति चारित्तरक्खट्ठा ।।९।। पंचिंदियदमणपरा जिणुत्तसिद्धतगहियपरमत्था । पंचसमिया तिगुत्ता सरणं महपरिसा गुरुणो ॥२॥ इसा जे उपाध्याय द्वादशांगीसूत्रना भणणहार । श्रुतधर श्रीउपाध्याय प्रतइ माहरउ नमस्कार पंचांगप्रणाम त्रिकालवंदणा सदा हउ । नमो लोए सव्वसाहूणं – सर्वलोकमाहि जे छइ साधु प्रतइ माहरउ नमस्कार हउ । . किसा छइ ते लोके ? अढाईद्वीप पनरहकर्मभूमि, पांच भरतक्षेत्र, पांच मेरुनइ दक्षिणनइ पासइ, पांच ऐरवतक्षेत्र, पांच मेरुनइ उत्तरनइ पासइ, पांच माहाविदेहक्षेत्रि, पांच मेरुनइ उभयपक्षि पनरह कर्मभूमि । पंचतालीस लक्षयोजन प्रमाण मानुष्यक्षेत्र, तेहमाहि,एकसत्तरि आर्यक्षेत्र, तेमाहि जिके छइ साधु रत्नत्रय साधइ । किसा छइ ते रत्नत्रय.? सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन, सम्यग्चारित्र ए रत्नत्रय साधइ । पंच महाव्रतधर, छट्टउ रात्रीभोजन वरजइ, सात भय टालइ, आठ मद
SR No.520570
Book TitleAnusandhan 2016 05 SrNo 69
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2016
Total Pages198
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size12 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy