SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 100
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ फेबुआरी - २०१५ सं. १९१२मां सूरतना एक श्रावके लीधेल १२ व्रतनी टीप - सं. विजयजगच्चन्द्रसूरि (डेलावाळा) ॥ श्री गुरुभ्यो नमः, श्री परमात्मने नमः ॥ __ प्रथम देवता श्रीअरिहन्त, अढार दोष रहित, एहवा जे अरिहंत तेहना च्यार निक्षेपा, ४ ते किम, प्रथम नामनिक्षेपो ॥१॥ थापनानिक्षेपो ॥२॥ द्रव्यनिक्षेपो ॥३॥ भावनिक्षेपो ॥४॥ नामजिणा जिणनामा, ठवणजिणा पुण जिणंदपडिमाओ । दव्वजिणा जिणजीवा, भावजिणा समोअसरणत्था ॥१॥ अस्यार्थः - प्रथम नामनिक्षेपो ते स्युं कहिइं, श्रीरिषभदेव-महावीर प्रमुख जिननाम छे ते नामनिक्षेपो कहिइं ॥१॥ थापनानिक्षेपो तें स्युं, प्रभुनां बिंब, प्रभुनां पगला प्रमुख थापना जोग्य जे वस्तु तेहने थापनानिक्षेपो कहिये ॥२॥ - द्रव्यनिक्षेपो ते स्युं, कृष्ण श्रेणिक प्रमुख जे जिन थानार छे, एहवा जीवद्रव्य ते जे तीर्थंकर सिद्ध थया ते पण द्रव्यनिक्षेपो कहिइं ॥३॥ भावनिक्षेपो ते स्युं, वर्तमानकाले समोवसरणे बिराजमान विहरमान २० तीर्थंकर छे ते भावनिक्षेपो कहिइं ॥४॥ एहवे च्यार निक्षेपे सिद्ध जे थया, राग द्वेषथि विमुक्त थया, पोताना ...गुणना भोगि, परभावना अभोक्ता, स्वसत्ताधर्म जेहने प्रगट थयो छे, एहवा जे अरिहंत देव, तेहने देवबुद्धे आदरुं ॥ गुरु ते सुसाधु, परम्परागत सुधि(शुद्ध) सद्दहणाना धणि, पंच महाव्रतना पालणहार, साधु गुणे विराजमान होइं, ते शुद्ध गुरु जाणुं । तथा काल प्रमाण(णे) यति होइं, ते यथाशक्ति संजमना पालणहार, जिनमारगना उपदेशणहार, एहवा वर्तमानकाल प्रमाणे यति होइं, एहवा गुरुबुद्धिइं आदरं ॥ धर्म श्रीवितरागनो भाख्यो दयामूल, जे आणामूल ते शुद्धं अहिंसक
SR No.520567
Book TitleAnusandhan 2015 03 SrNo 66
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2015
Total Pages182
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size12 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy