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________________ नवेम्बर - २०१४ ७३ अनुसन्धान-६५ रतनागर पासे वसे रे लाल, रतनजिहाज अनेक सुभकारी रे, परदेसी परखंडना रे लाल, व्यापारी सुविशेष सुभकारी रे. ११ गांम नगर पुर अति घणां रे लाल, पगि पगि प्रबल निवास सुभकारी रे, कोट प्रासाद घरि मालीया रे लाल, अति सुंदर आवास सुभकारी रे, १२ मेघ जिहां वरसें घणो रे लाल, निरमल वहे बहु नीर सुभकारी रे, वनसपती फूलें घणी रे लाल, सुरभि झरे बहु खीर सुभकारी रे, १३ रतनागरथी जिहां कणे रे लाल, साहूकारने संग सुभकारी रे, रतन प्रवालादी तणा रे लाल, प्रवहण आवे यंग सुभकारी रे. १४ सुंदर रूप सोहामणो रे लाल, सुरपतिने अनुहार सुभकारी रे, . चतुराई गुण आगला रे लाल, मानव जिहां मनुहार सुभकारी रे, १५ चंदवदन मृगलोचनी रे लाल, हरिलंकी गजचाल सुभकारी रे, अपछरनें अनुहारडे रे लाल, मीठा बोली बाल सुभकारी रे. १६ इम अनेक गुणे सोहतो रे लाल, सुंदर सोरठदेस सुभकारी रे, कहीइ जिहां लहीये नही रे लाल, दुर्भिक्ष डमर-प्रवेश सुभकारी रे. दूहो : शेर्बुजय गिरनारगिरि, मोटा तीरथ दोय, तिण कारण देसां सिरे, जिनमत मांहे जोय. १ जीहो क्रोधादिक उद्धत सदा लाला, विरूआ च्यार कषाय, जीहो पाठीन पीठ-नक्र-चक्र ए लाला, जलचर रहे मुरझाय. ५ जीहो उपसमरतिपति अंतरे लाला, ओपें अंतरद्वीप, जीहो सरवमती आवी मिले लाला, नदीयां नीर समीप. ६ जीहो जलनिधि ज्यूं जलस्युं भर्यो लाला, गाजें गुहिर गंभीर, जीहो तिम उपदेस गुरु आपता लाला, सुंदर सब्द सधीर. ७ जीहो सागरमांहें सोहे सदा लाला, जंघ शबल जिहांज, जीहो गुरुमां ज्ञान विराजतो लाला, तारे सकल समाज. ८ जीहो वडवागनि कर्दम कह्या लाला, सागर माहें शेष, जीहो गुरुमाहें ए दीसे नही लाला, तिणे करी जाणो विशेष, ९ जीहो धन्य श्रावक धन्य श्राविका लाला, पडिलाभे सूरिराय, जीहो निज मंदिर पावन करें लाला, पधरावे गुरुपाय, १० जीहो विजयदयासूरिंदनो लाला पट्टप्रभावक सूर, जीहो तपगछपति नित नित तपो लाला, श्रीविजयधर्मसूरि. ११ चतुरनर ! सेवो श्रीगुरुचंद..... अथाष्टकम् ॥ श्रीमद्गच्छाधिभत्रु(तुः) चरणमधुपतां ये श्रयन्तीह भव्यास्त्यक्त्वा कार्यान्तराणि प्रतिदिवसमहो ! श्रद्धया पूरितागाः । तेषां गेहं कदाचित् त्यजति न कमला चञ्चलत्वं विहाय, सत्सङ्गान्नो जनानां भवति न कथं सद्गुणानां प्रवृत्तिः ॥१॥ सकलया कलया कलित[:] प्रभुः, प्रभुतया विदितो विदितागमः । गमनयार्थविचारणतत्पर[:], परमनिर्वृत्तिनिर्वृतयेऽस्तु नः ॥२॥ कामं ददाति भविनां नु विलोकितो य, आकर्णित: क्षिपति दुर्गतिदुःखजालम् । संसेवितो वितनुते श्रियमाश्रितानां, सोऽयं शुभानि विदधातु विभुय(य)तीनाम् ॥३॥ हाल ॥ जीहो गुरुं दरीया गुणे करी लाला, समवड जाणो संत, जीहो तेह तणी विधि वर्णवू लाला, सुणज्यो भवि तजी भ्रांत. १ चतुरनर ! सेवो श्रीगुरुचंद..... जीहो उपसमनीर समावता लाला, चातुर चारितनाव, जीहो पंच महाव्रतरयण ए लाला, गंभीर धीर स्वभाव. २ जीहो विद्याई विविध अगाध लाला, वाणीकल्लोल विलसंत, जीहो मद्दवमोजां उछले लाला, विविध किरिया वरत. ३ जीहो चउदह विद्या चूपसुं लाला, चौदह रयणनी जात, जीहो साधु धरम अंगे धरे लाला, मरजादा विख्यात. ४
SR No.520566
Book TitleAnusandhan 2014 12 SrNo 65
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2014
Total Pages360
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size1 MB
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