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________________ सहेजे प्रश्नार्थ खडा करती होय छे. मजानी वात ए छे के तेओने आ प्रश्नार्थो विशे कशी ज अभिज्ञता नथी के ते विषे कशी परवा पण नथी होती. __ संशोधन अने स्वाध्याय व्यक्तिने नम्र बनावे, अभिमानी वृत्ति-वर्तनथी चेतवे; वधु अन्तर्मुख बनावे, बहिर्मुखता घटाडे; शास्त्र तथा तेना अर्थ माटेनी पोतानी हठीली मान्यताओ परत्वे पुनर्विचार करवा प्रेरे, अने तथ्य तेमज तत्त्वनी वधु समीपे लई जाय; अन्य पासेथी पण जे साचुं-सारं होय ते शीखवा प्रेरे, अने अन्य पासे सासू-साचुं होय ज नहि एवी मिथ्या धारणाथी उगारे. शास्त्रसंशोधन ए मात्र शास्त्रमा ज शोधन करे एवं नहि, ए शोधकनी दृष्टिनुं पण शोधन-सम्मान करे छे. हरिभद्राचार्ये 'दृष्टिसम्मोह'ने भयानक दोष गणाव्यो छे. संशोधन अटले के संशोधक वृत्ति, आपणने दृष्टिसम्मोहथी बचावे-बचावी शके छे. जो एq न थाय तो पछी पेलुं संशोधन मात्र शास्त्रपाठ पूरतुं सीमित रहे, 'दृष्टि' - जीवनदृष्टि अथवा तात्त्विक समजण साथे एने कशो ज अनुबन्ध न रहे. अने तो, तेवा शोधकार्यने साधना गणवानुं साहस पण न ज कराय.
SR No.520560
Book TitleAnusandhan 2012 07 SrNo 59
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2012
Total Pages161
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size6 MB
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