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________________ फेब्रुआरी - २०१२ ११९ डांस-मंस परीसहो सही, डांस मसा उडाडइ नही वस्त्र छतइ वस्त्र वांछइ नही, अचेलपरीसो कहीए सही ॥९१।। अरतिपरीसहो मन उद्वेग, स्त्री देखी आंणे संवेग, चर्यापरीसहें वीहार ज करइ, कष्ट सहें मन धीरज धरइ ॥९२।। सझायभूमि डोलइ नही, नसीयापरीसह एहज सही, रूडो भूडो स्थानक नवि कहे, सेज्यापरीसहो निसदिन सहै ॥९३॥ कडुया वचन अहियासे जेह, अक्रोसपरीसह कहीए तेह, मारता कुटतां खिमा करइ, वधपरीसहो इणिपरि धरइ ॥९४|| भीक्षा मांगतां न करे अभिमांन, जाचनापरीसो इणिविध जांन, अणलाधे दीनज नवि थाय, अलाभपरीसो ते कहिवाय ॥९५।। रोग आव्ये उषध नवि करइ, रोगपरीसहो इणिपरि धरइ, डांभ तरणांनो फरसज सहें, तणफासपरिसो इणिविध कहें ॥९६॥ दीलनो मेंल उतारें नही, मलपरीसो कहीए सही, आदर देखी न करे अभिमांन, सतकारपरीसो एहज जान ॥९७।। भण्या गुण्यानो गर्व नवि करइ, परीगन्यापरीसहो इणिपरि धरइ, भणतां नावें तव दीन नवि थाय, अनांणपरीसो ए कहिवाय ॥९८॥ समकितथी नवि डोले जेह, समकिंत परीसहो कहीए तेह, क्षांति क्षमा जे क्रोध नवि करइ, आर्जवपणो अभिमांन नवि धरइ ॥९९॥ मुत्ती ते लोभनो परिहार, तप छ भेदे कहीयो सार, संजम सत्तर भेदे आंण, सत्य सांचो बोलेवो जांण ॥१००॥ जेणि क्रिया कर्म लागै नही, शौचपणो ते कहीए सही, अकिंचनपणे धन न रखाय, नव वाडि सहीत ब्रह्मचर्य कहिवाय ॥१०१॥ दसविध यतीधर्म कह्यो सार, चालीसमो ए संवरद्वार, बार प्रकारे भावना कही, पांच प्रकारे चारित ग्रही ॥१०२॥ सतावन भेदे संवरद्वार, श्रावक ते धारे निरधार, । छ भेदे तप बाह्य ज कह्यो, छ भेदे अभिंतर लह्यो ॥१०३।। बारे भेदे निर्जरा सार, पाले ते उतरें भवपार, अणसण छठ अठमादि करइ, अणोदरी पेट पूरो नवि भरइ ॥१०४||
SR No.520559
Book TitleAnusandhan 2012 03 SrNo 58
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2012
Total Pages175
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size4 MB
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