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अनुसन्धान ५१
धर्मनी परीक्षा, धर्मना गुणो व. वर्णवतो आ ग्रन्थ टीका सहित, हंसविजयजी फ्री लायब्रेरी - अमदावादथी ई. १९२४मां प्रताकारे प्रकाशित थयो हतो. तेनुं विषयानुक्रम, ७ परिशिष्ट व. साथे, शुद्धीकरणपूर्वक आ नवीन संस्करण पुस्तकाकारे प्रकाशित थयुं छे. सम्पादन, मुद्रण वगेरे उत्तम छे. एक बे सूचनो करवा जेवां लागे छ :
नवा संस्करण वखते ग्रन्थने एक वार हस्तलिखित प्रतिओ साथे मेळवी लेवामां आवे ते इच्छनीय छे. खास करीने सम्पादक साध्वीजीए जणाव्युं छे तेम "प्रथमावृत्तिमां अमुक पृष्ठ पर अक्षरो बराबर छपाया न होवाथी, ते अक्षरो समजाता न होवाथी क्षतिओ रही गई होय..." एवी परिस्थितिमां हस्तलिखित प्रतिओनो सहारो अवश्य लाभदायक बने.
बीजूं, परिशिष्टो आपवानो उपक्रम आवकारदायक ज छे. पण ए परिशिष्टो केवल संख्यापूरक न बनी रहेतां उपयोगी पण होय तेवो आग्रह अवश्य राखवो जोईए. नानकडी प्रशस्तिना श्लोकोनो अकारादिक्रम पण परिशिष्ट तरीके आपवो बिनजरूरी लागे छे.
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श्रद्धांजलि तेरापन्थ धर्मसंघना जैनाचार्य आचार्य श्री महाप्रज्ञजीनो समाधिपूर्ण | स्वर्गवास ताजेतरमां सरदार शहेर (राजस्थान)मां थयो छे, तेथी भारतीय तथा ।
जैन विद्याजगतने एक प्रज्ञावन्त विद्यापुरुषनी खोट पडी छे. तेमनां संशोधनकार्यो, विद्या-कार्यो तथा आगम-सम्पादनो थकी तेओ जैन जगतमां हमेशां याद
रहेशे. तेमना आत्माने शान्ति तथा धर्मशासननो लाभ हो ! - -- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -