SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 50
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ मार्च २००९ खाड खाणी. गाडीयौ रंधाणीनैं पासो रे । ऊपर कीधौ ओटलौ नांखें पडी नीसासो रे कपट० ॥६॥ मैं आवी गणिका भणी कह्यौ सगलौ अधिकारो रे । वेश्या कहैं माहरौ कह्यौ साच हूऔ सुविचारो रे कपट० ॥७॥ पूठौ आयौ प्रेमसुं राजगृही पुर ठामो रे । रंगें वेश्याएँ रहुं करुं कुतूहल कामो रे कपट० ॥८॥ मातपितारै मोहसुं आयौ वलि उज्जेणो रे । मन सूधैं सगला मिल्या हुआ अति हरखेणो रे कपट० ॥९॥ रातें सूणहरै आयौ निपटज हरखी नारो रे । अति मौडा क्युं आवीया हुं बोल्यौ तिण वारो रे कपट० ॥१०॥ कारण मैं जोईयो मांस किहांई न लद्धो रे । काम सर्यां विण तझ कनैं आयौ नेह विलुद्धो रे कपट० ॥१॥ मन ऊपर लैं माहरी सरव करै छै सेवो रे । चूल्हा पासै चौतरौ दिल सुध तेहिज देवौ रे कपट० ॥१२॥ वस्तु जिकाई वापरै घरमाहे फलफलो रे । पहिली तिणनैं चाढिनैं खांणी पछै कछूलो रे कपट० ॥१३॥ चरित देखि में चीतव्यौ देखें इण रौष्यालो रे । वसत भली वपरांवता पहिली राखं पालो रे कपट० ॥१४॥ दोहा मैं कहीयौ सुणि मानिनी हुई घेवर हुस । मुझथी पहिली किणहिनैं देइस तौ तुझ सुंस ॥१॥ कर जोडी मोसुं कहैं नेह ऊपरि लैं नारि । मोहरै तौ मन सुद्धसुं भलौ तिको भरतार ॥२॥ घेवर छांटें ते घरणि हुं पिण बैंठौ पास । थाली लेइ घडा क. ताकुं घेवर तास ॥३॥ ऊंन्हौ घेवर उतर्या मैं कहीयौ मुझ मेलि । बोलैं हाथ बली बली घडा ऊपरि 3 ठेलि ॥४॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520547
Book TitleAnusandhan 2009 00 SrNo 47
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2009
Total Pages86
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size5 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy