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________________ ३८ अनुसन्धान ४४ एयं मुत्तूण भवं पत्तो संसारसायरे घोरे । को जाणइ किर कइया गुरुपाए हं लहिस्सामि ।। २८ ।। ओ ! तं जीव ! अलज्जिर ! भणिओ धम्मोवएसलक्खेहि । जइ नेव किंपि लग्गं ता सरणं मज्झ किर मोणं ॥ २९ ॥ विसयविरत्ता मुणिणो कालोच्चिय संजमंमि जे निरया । आजम्मंपि तिसंक(झ) पयहूलिं वंदिमो ताण ॥ ३० ॥ पइदियहं पइसमयं खणंपि मा मुयसु एयमुवएसं । जइ भवदहाण तित्तो तिसिओ उण परमसोक्खाण ॥ ३१ ॥ सिरि धम्मसूरिपहुणो निम्मलकित्तीइ भरियभुवणस्स । सीसलवेहि कुलयं रइयं सिरि रयणसूरीहिं ॥ ३२ ॥ छ ।। OG (१६) श्री मनोनिग्रह भावना कुलकम् सिरि धम्मसूरि पहुणो उवएसामयलवं सुणेऊणं । तं चेव तिहा नमिउं मणनिग्गहभावणं भणिमो ॥ १ ॥ संसारभवणखंभो नरयानलपावणंमि सरलपहो । मणमणिवारियपसरं किं किं दुक्खं न जं कुणइ ? ॥ २ ॥ वायाए काएणं मणरहियाणं न दारुणं कम्मं । जोयणसहस्समाणो मुच्छिममच्छो उयाहरणं ॥ ३ ॥ वइ-कायविरहियाण वि कम्माणं चित्तमेत्तविहियाणं । अइघोरं होइ फलं तंदुलमच्छोव्व जीवाणं ॥ ४ ॥ गलियविवेयाण मणो निग्गहिउं दुक्करं फुडं ताव । संजायविवेगाण वि दुक्करमेयंपि किर होउ ॥ ५ ॥ करयलगयमुत्तीणं तित्थयरसमाणचरणभावाणं । ताणं पि हु जं दुक्कर-मेयमहो ! मह महच्छरियं ! ॥ ६ ॥ मणनिग्गहवीसासो कइयावि न जुज्जए इहं काउं । अप्पडिवायं नाणं उप्पन्नं जा न जीवाणं ॥ ७ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520544
Book TitleAnusandhan 2008 06 SrNo 44
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2008
Total Pages126
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size6 MB
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