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________________ ६ चित्तसिय- पंचमीए सम्मेए तं मुणीण सहसेण । सेलेसीमारुहिउं जत्थ गओ तत्थ मन्त्रेसु (मं नेसु) ॥८॥ अनुसन्धान- ४० सिरि संभवणाह - थुत्तं सिरिसंभवजिण ! सत्तम ! सत्तम - गेविज्जयाउ सावत्थि । फग्गुणसियट्ठमी पत्तोसि सुहाय वसुहाए ||१|| जाओ जिआरि-सेणाण सुद्धमग्गसिरचउदसीइं तुमं । कणयतुलियंग चउसयधणुतुंग तुरंग - लंछणय ॥२॥ पन्नरस - पुव्वलक्खे कुमरो चउचत्तपुव्वलक्खा य । चउरंगाणि य राया भविऊणं मणुय सहसेण ||३|| मग्गसिर - पुन्निमा कयछट्टो निग्गओ सहस्संबे | बीयदिणे परमन्नं सुरिंददत्ताउ पत्तोसि ||४|| चउदस - वरिसंते पंचमीइ कसिणाइ कत्तिए नाणं । तम्मि वणे जणिय कयं गणहारिसयं दुरुत्तरयं ॥५॥ लक्खदुगं साहूणं अज्जा छत्तीससहसलक्खतिगं । नाह ! तुह तिमुह - दुरियारि मित्तसेणा सया भत्ता ||६|| पुव्वाण लक्खमेगं चउरंगूणं तवेण खविऊणं । अजियजिणाओ सागर-कोडी-लक्खाण- तीसाए ||७|| चित्तसियपंचमीए तं निट्ठिय सट्ठि - लक्ख- पुव्वाउं संजयसहस-समेयं-सम्मेए निव्वुयं वंदे ॥८॥ सिरि अभिणंदणणाह-थुत्तं सरिमो सिरिअभिनंदणजिणिंद ! वइसाहसियचउत्थीए । जय नाह ! जयंताउ तुज्झ अवज्झाइ अवरणं ॥ १ ॥ संवर-सिद्धत्थाणं कणयपहो माह - सुद्धबीयाए । अद्ध-चउत्थ-धणुस्संयतणु वानरचिंध जाओसि ||२|| Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520540
Book TitleAnusandhan 2007 07 SrNo 40
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2007
Total Pages96
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size5 MB
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