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फेब्रुआरी - 2006
39 पद षष्टिलक्ष जिन भाषियो, पूरव चोथो गुणधार हे माय ॥
सु० ॥१॥ सप्त भंगिइं सोहतो, अस्तिनास्ति परवाद हे माई । दसईभ वस्तु दस चूलिका सूचक कीनो अगाध हे माय ॥
सु० ॥२॥ त्रिक शुद्धी एहनें सदा, विनयें पूज रचाइ हे माय ।। तेहथी निधि उदयें करी चारित्रनंदि सुख थाइ हे माय ॥
सु० ॥३॥ काव्यं ॥ स्याद्वादत्वं पदार्थे मनसि मुनिवराः भावयन्त्यत्र पूर्वे, अस्तित्वं नास्तिकं स्यादहितमुभयकं द्वाववक्तव्ययोगौ । गुप्त्यैकं भूधराणि त्रिभुवनपदगं विस्तृतैः सूचितं च तत्तं पूर्वं यजेयं परमसुखनिवासाय सद्र्व्यपुजैः ॥१॥
ही० अस्तिनास्तिवाद पूर्व० ॥ इत्यस्तिनास्तिप्रवादपूर्वार्चनम् ॥२॥१२॥४
दोहा ॥ पंचम पूरव पूजियै पंचम गति दातार । ज्ञान प्रवादें नाणनें भाख्यो अरथ विचार ॥१॥
ढाल ॥ श्रीसंखेशर पास ॥ ए चाल ॥ पूरव नानप्रवाद धरो निज उरकनें । युगट वस्तु विचार तेहिज रिधिसंपजै ॥ बहिरातम तज योग लहै अंतरातमा । सिद्धी सत्ता वास हुवै परमातमा ॥१॥ काल अनादि अनंत दलै करम वरगना । साधे सादि अनंत केवल बोध दरशना ॥ नाण तणो अधिकार पूरव मांहें कह्यो । एकउनकोटपदमांन अरथ बहु संगह्यो ॥२॥
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