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________________ अनुसंधान-२२ शि० शि० १५ पहिली घाटी चढी करी ए सीतानाले विश्राम शि० १० स्नान करी निरमल जलै ए पावन करवो अंग शिo धोई निरमल धोतीया ए आगै चढणो उतंग शि० ११ अधिष्ठायक तीरथतणी ए पूजेवि शासनदेवि शासनदेवि सानिधि करी ए पूरै मनोरथ हेवि शि० १२ केसर चंदन घसि भला ए मृगमद नै घनसार शि० वीसै ढूंक जुहारियै ए सफल गिणो अवतार शि० १३ जव अक्षत पुष्प अभिनवा ए बरक रुपेकै कराय शि० श्रीफल पूगीफल घणा ए कुसुम सुगंध चढाय शि० १४ पांचूं अभिगम साचवू ए पूजु पारसनाथ.. स्नात्र महोच्छव नवनवा ए खरचो संपति साथ सहसफणो तेवीसमो ए मनमोहन महाराज भवियण वंदै भावसुं ए सारै आतमकाज शि० १६ सजलकुंड शोहामणो ए पासें पगल्या जिन वीस शि० ते देखी मन गहगह्यो ए प्रणमूं भाव जगीस शि० १७ फेरी देवो जिनबिंबनी ए आरती उतारु आय शि० सांहमी मिल रातीजगो ए राश भास गुण गाय शि० १८ . . दुहा ॥ समेतशिखर ए तीरथै महोच्छव करियै अनेक .. जन्म सफल करिवा भणी बाधी हृदय विवेक १ इहां वीसै जिन आवीया मास भक्त तप धार ए जिन ए गिरि उपरै सीधा भविहितकार ...२ ___ढाल २ । तुमे चेतो रे चेतो प्राणिया - ए देशी ॥ जिन नगरी जिनजी जनमिया ते वरणबूं उधा(दा)र । एहि ज जंबूद्वीप मै भलो दक्षिण रे एह भरत मझार क ॥१॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520522
Book TitleAnusandhan 2003 01 SrNo 22
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2003
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size5 MB
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