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________________ [15] वंदिऊणं - सिद्धत्थत(य)स्स अंते 'उज्जिता'इ सिलोगपढणं [च] । 'चत्तारि' त्तिय गाहं पच्छा गोयमरिसी काही ।। एसो कंचणं(ण)वलाण उद्देसो ॥ जं समयं अरहा अरिठ्ठनेमी उज्जिते केवलनाणे तं समयं कासरहंसि सिर (रि?) भट्टधूया कोडीनगरम्मि सोम(म) भट्टभारिया कोहिंडिगुत्ता अंवेसरी भयवं अरिहनेमिणा अट्ठमस्स पारणं अंबाए कारियं । वुट्ठाउ पंचसराउ (?) । अन्नया वरदिन्नपारणए पइताडिया सिवकर-विभकर सहिया दह(ढ?)सम्मत्ता सिरिअरिहनेमि पाए समरंती रेड(रेवय)संमुहा, पहे पई पिच्छिऊण सा(स)हयारसाहाए कालगया, सोलसविज्जादेवीउ जत्थ चिटुंति । भुवणवईमज्झि जंवुदीवपमाणभुवणा अणेगजक्खगण -गंधव्वसहस्स परिभु(वु)डा महा सम(म्म)द्दिविणा(ट्ठिी) अरिट्टिनेमिपए समरित्ता उहिनाणेणं रेवयसिहरंसि भगवंतं वंदिऊण महिमं करेइ तत्थ अरिहनेमिपडिमाए। कण्हेणावि रुप्पहेममयी पडिमा इमा कारिया वरदिन्नपइट्ठिया । तत्थ अंवगेणवरयं महिमा(मं) करेइ । सिरिसमणसंघवन्निया चउव्विहदेवाइट्ठसोहम्माइ(हिवइ ?) सक्केण सासया देवया पट्टविया । तित्थपभावगा महिड्डिया भव्वाणं समाहिवोहिलाभ- कारगा मिच्छतनिद्धाडिणी तिरियं भंग(?) मिच्छद्दिट्ठियोरुवसग्गरक्खयणकरी ठाविया। तत्थ रयणमई पडिमा वंभिंदकया । चउव्विह संघपसंसिया वेयावच्च गर(री) काउसग्ग चिंधेण समागम्म सव्वरक्खणकरी । जउ चउविह संघस्स चेईयवंदणावसरम्मि चत्तारि थुईउ सिलोगव(प)माणाउ पवट्टमाणाउ अक्खरेहिं सरिसे ?] हिं(सरेहिं ?) पउत्ताउ। अंबा महापभावा तइयभवमुक्खगामिणी वीससहसा लक्खाउया एयं तित्थं अणुदिणं आराहेइ ।। एवमुद्देसो(सा ?) पंच ॥ चउप्पन्न अहोरत्ता आवासित्ता आसोयअमावसाए उप्पन्नं केवलं नाणं । रेवयसहसंव[व]णे पडिवोहिया वहवे जीया । के(क)उ चाउवन्नो संघो वरदत्ताईया इक्कार गणहरा पट्टविया । अट्ठारस सहस्ससमणा कया। राइमई चत्तालीससहस्सपरिवा[रा] निक्खां(क्खं)ता। वहवे जीया पडिवोहिया । ढंढणकुमारो पव्वई(इ) उपुव्वकम्मज्जियअंतरायावरणियदासेणं अट्ठन्हं Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520506
Book TitleAnusandhan 1996 00 SrNo 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year1996
Total Pages122
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size6 MB
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