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________________ जिन सूत्र भाग: 2 जाता है और बंजारे को अपना तंबू उखाड़ लेना पड़ता है। चल | कहते हैं, जो क्षणभंगुर है उसे भोग लो। कहीं क्षण बीत न जाए। पड़ना पड़ता है। | हम कहते हैं, इसके पहले मौत आए, जीवन को जी लो, निचोड़ 'पंडितमरण, ज्ञानपूर्वक मरण सैकड़ों जन्मों का नाश कर देता लो रस। कहीं ऐसा न हो, कि मौत आ जाए और तुम रस ही न है, अतः इस तरह मरना चाहिए जिससे मरण सुमरण हो जाए।' | निचोड़ पाओ। अदभुत सदगुरु रहे होंगे महावीर। सिखाते हैं मरने की कला। चांदनी की डगर पर तुम साथ हो कहते हैं, ऐसे मरो कि मरण सुमरण हो जाए। प्राण युग-युग तक अमर यह रात हो कैसे होगा मरण सुमरण? रोज-रोज मरो। प्रतिपल मरो।। कल हलाहल ही पिला देना मझे सुबह मरो, सांझ मरो। रात जब सोओ तो मर जाओ। जो दिन आज मधु की रात मधु की बात हो बीत गया उसके लिए मर जाओ। जो-जो बीतता जाता है उसके | हाथ में रवि-चंद्र पग में फूल है लिए मरते जाओ, उसको इकट्ठा मत करो। उसका बोझ मत नृत्यमय अस्तित्व उन्मद झूल है ढोओ। बोझ की तरह अतीत को मत खींचो। जो गया, गया। रिक्त भीतर से मगर यह जिंदगी उसे जाने दो। प्रतिपल नए हो जाओ! इधर मरे, उधर जन्म। | बस बगूले-सी भटकती धूल है इधर पुराने को छोड़ा, नए का आविर्भाव। रात है, मधु है, समर्पित गात है तो मौत तुम्हें ऐसी जगह नहीं पाएगी, जहां तुम्हारे पास कुछ | आज तो यह पाप भी अवदात है छीनने को हो। तुम्हारे पास कुछ होगा ही नहीं। किसी क्षण मौत | सघन श्यामल केश लहराते रहें आएगी तो तुम तो हर वक्त अतीत के लिए मरते जाते हो। अतीत | मैं रहूं भ्रम में अभी तो रात है। के संबंध, आसक्तियां, राग, धन, पद, प्रतिष्ठा...तुम तो मरते चांदनी की डगर पर तुम साथ हो जाते हो। सम्मान-अपमान, सफलता-विफलता...तुम तो मरते | प्राण युग-युग तक अमर यह रात हो जाते हो। सुख-दुख, विषाद...तुम तो मरते जाते हो। -जो होना नहीं है उसकी हम आकांक्षा करते हैं। मृत्यु एक दिन आएगी, तुम कोरे कागज की तरह पाए / प्राण युग-युग तक अमर यह रात हो! जाओगे। तुम्हारे पास पकड़ने को कुछ न होगा। तम्हारे पास | -कोई रात, कोई नींद, कोई सपना युग-युग तक होने को बुलाने को कुछ न होगा, चीखने-चिल्लाने को कुछ न होगा। नहीं है। तुम जानोगे, कोई मेरा नहीं। तुम जानोगे, कुछ मेरा नहीं। तुम चांदनी की डगर पर तुम साथ हो खड़े हो जाओगे। तुम जूते पहनकर खड़े हो जाओगे। तुम मौत कौन किसके साथ है? चांदनी बड़ा झूठा सम्मोहन है। कौन के हाथ में हाथ डाल लोगे। तुम कहोगे, मैं तैयार हूं। मैं तो सदा किसके साथ है? लगते हैं कि लोग किसी के साथ हैं। राह पर | से तैयार था, इतनी देर क्यों लगाई ? इतनी देर कहां रही तू? | अनजान मिल गए यात्री हैं। पलभर को साथ हो गया। कबसे हम प्रतीक्षा करते। कबसे हम तैयार बैठे थे। नदी-नाव संयोग हैं। अभी नहीं थे साथ, अभी साथ हैं, अभी बस, ऐसे आदमी से मौत हार जाती है। इसको महावीर | फिर बिछड़ जाएंगे। सुमरण कहते हैं। कल हलाहल ही पिला देना मुझे जीवन को, जो कि क्षणभंगुर है, उसे शाश्वत मत समझो। जो -कल मौत आए, ठीक। कल जहर पिलाओ. ठीक। | जाएगा वह जा ही चुका है। जो मिटेगा वह मिट ही रहा है। जो | आज मधु की रात मधु की बात हो। छूटेगा, वह तुम्हारे हाथ से छूट ही रहा है। व्यर्थ अटके मत तो साधारणतः हम मृत्यु को टालते हैं कि कल होगी मृत्यु। रहो। व्यर्थ मुट्ठी मत बांधो, खोलो मट्ठी। आज तो जीवन है। आज क्यों मृत्यु की बात उठाएं? लेकिन हमारी तर्कदृष्टि और है। हम कहते हैं, जो छूटनेवाला ऐसे विचारक भी हैं जगत में जो कहते हैं, मृत्यु की बात ही है उसे जोर से पकड़ लो कि कहीं और जल्दी न छूट जाए। हम उठानी रुग्णता है। उनकी दृष्टि में महावीर तो मार्बिड, रुग्ण 556 Jain Education International 2010_03 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.340158
Book TitleJinsutra Lecture 58 Pandit Maran Sumaran Hai
Original Sutra AuthorN/A
AuthorOsho Rajnish
PublisherOsho Rajnish
Publication Year
Total Pages1
LanguageHindi
ClassificationAudio_File, Article, & Osho_Rajnish_Jinsutra_MP3_and_PDF_Files
File Size30 MB
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