________________ पुराना। TT हला प्रश्न: आप एक ही बात कहते हैं से सख्त चट्टानों पर। जल तो बहुत कोमल है, चट्टान बड़ी सख्त न अनेक-अनेक ढंगों से। पर जब आपको सुनता हूं है पर धार गिरती ही रहती है, गिरती ही रहती है, गिरती ही रहती तो उस समय यही लगता है कि पहली बार सुन | है, एक दिन चट्टान टूट जाती है, रेत होकर बह जाती है। कोमल रहा हूं। और इतना आनंद मिलता है कि वापिस घर लौटकर जीत जाता है सख्त पर। निर्बल जीत जाता बलशाली पर। पहाड़ जाने का जी नहीं करता। क्या करूं, मैं क्या करूं कि आपको से गिरते हुए झरने को देखकर तुम्हें कभी याद आया या सुनता ही रहूं! नहीं-निर्बल के बल राम। नहीं आया, तो फिर तुमने पहाड़ से गिरता झरना नहीं देखा। झरना जीत जाता है, जिसका कोई भी एक ही बात है कहने को। क्योंकि एक ही सत्य है जानने को। बल नहीं। चट्टान हार जाती है, जिसका सब बल है। सच पूछो तो एक बात भी कहने को नहीं है। जानने को है कुछ, | आदमी का मन तो है चट्टान की भांति। बड़ा सख्त। सदियों कहने को नहीं। जागने को है कुछ, सुनने को नहीं। | पुराना। बड़ा प्राचीन। सनातन। सदा से चला आया। और कुछ है, जो कहा नहीं जा सकता। उसी को कहना है। ढंग | चैतन्य की धार है जल, जलधार की भांति। अभी-अभी। बदल जाते हैं। और अच्छा है कि तुम्हें याद रहे कि मैं एक ही | अभी-अभी फूटी। अभी बूंद-बूंद टपकी। लेकिन जीत जाएगी बात कह रहा हूं। ढंगों में बहुत मत उलझ जाना। बहुत लोग | चैतन्य की धार। उलझ गये हैं। कोई हिंदू में, कोई मुसलमान में, कोई जैन में, वे | तो रोज-रोज तुमसे एक ही बात कहता हूं, वही जलधार है, सब ढंग हैं। कहने के भेद हैं। अभिव्यंजनाएं हैं अलग-अलग। वही जलधार है। पहले दिन न टूटेगी चट्टान, दूसरे दिन टूटेगी। अभिव्यक्तियां हैं अलग-अलग। जो कहा गया है, वह एक है। आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, चट्टान और जो कहा गया है, वह कुछ ऐसा है कि कहा नहीं जा सकता पड़ेगा। चट्टान पुरानी है, पर निष्प्राण है। जलधार नयी है, पर है। इसीलिए बहुत ढंगों से कहना पड़ता है कि शायद एक ढंग सप्राण है। ढंग बदल लेता हूं, शब्द बदल लेता हूं। और चूक जाए, तो दूसरे ढंग से पकड़ में आ जाए। दूसरा चूके, तो इसीलिए मैंने सभी शास्त्रों के शब्द ले लिये हैं। क्योंकि जब मुझे तीसरे से पकड़ में आ जाए। इसलिए मैं रोज नये-नये इशारे यह दिखायी पड़ गया कि एक ही है, तो सभी शास्त्र मेरे हो गये। करता हूं। अंगुलियां अलग-अलग हों भला। जिस तरफ इशारा अब मुझे कोई फर्क नहीं है महावीर और मुहम्मद में, कृष्ण में है, वह निश्चित ही एक है। और क्राइस्ट में। ढंग का फर्क है। दोनों ढंग प्यारे हैं। अगर तुम कल चूक गये, तो आज मत चूक जाना। यह निरंतर जिस ढंग से तुम्हें समझ में आ जाए वही ढंग प्यारा है। ढंग पर एक ही तरफ सतत इशारा ऐसे ही है जैसे जलधार गिरती है पहाड़ मत जाना। वह जो ढंग के भीतर छिपा है, उस पर ही ध्यान 165 Jain Education International 2010_03 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org