________________ जिन सूत्र भाग : 1 विमुक्त है, निष्काम है और निक्रोध, निर्मान और निर्मद है।' है...। 'निराग, निग्रंथ, निशल्य...।' अगर एक ईसाई हिंदू हो जाये तो ईसाई कहते हैं, गद्दार। अगर महावीर के अपने पारिभाषिक शब्द हैं। निग्रंथ का अर्थ होता एक हिंदू ईसाई हो जाये, तो वे कहते हैं, सुमार्ग पर आ गया। वह है : जहां अब कोई ग्रंथि न रही; कोई एढ़ा-टेढ़ापन न रहा; कोई हिंदू की बात है। हिंदू अगर ईसाई हो जाये तो वो कहते हैं, गांठ न रही; जिसको मनोवैज्ञानिक काम्प्लेक्स कहते | गद्दार। अगर ईसाई हिंदू हो जाये तो वे कहते हैं, सदबुद्धि का हैं-ग्रंथि। वैसी कोई ग्रंथि न रही; आदमी सरल हुआ; चेतना जन्म हुआ। पर कोई बाधाएं, अवरोध न रहे; झरना बहने लगा, सब चट्टानें ग्रंथियों को हम छिपाते हैं। तो फिर जिसको हम छिपाते हैं, वह राह से हट गईं। अगर चट्टानें पूरी हट जायें तो झरने का शोर भी बढ़ेगा। ग्रंथियों को उघाड़ना पड़ेगा। बंद हो जाता है। झरने के करण थोड़े ही शोर होता है; शोर तो इसलिए तो महावीर नग्न हुए। वह 'नग्न' बड़ा प्रतीकात्मक चट्टानों के कारण होता है, बीच में पड़े पत्थरों के कारण होता है। है। उन्होंने कहा, जैसा हूं, जो हूं, अब कोई वस्त्र न रखूगा, सब चट्टानें हट जायें तो झरना एकदम शांत हो जाता है। आवरण न रखेंगा, अब सब उघाड़े देता हूं। अब कोई ग्रंथि जैसी जीवन-ऊर्जा जब शांत बहने लगती है, कोई ग्रंथि नहीं भी है, बुरी है, भली है, लोग स्वीकार करें, न स्वीकार करें...। होती...। अभी तो हमारे पास हजार-हजार ग्रंथियां हैं। अभी लोगों ने किस-किस तरह का व्यवहार महावीर से किया, तो हम सीधे बह ही नहीं पाते। अभी तो हमारे सारे कदम ऐसे हैरानी होती है! पड़ते हैं जैसे शराबी चलता है-लड़खड़ाते; हर घड़ी कल रात मैं देख रहा था एक जैन-ग्रंथ। लोगों ने पत्थर मारे, गिरने-गिरने को। एक पांव इधर पड़ता है, दूसरा कहीं और लकड़ियों से पीटा, जंगली जानवर छोड़े, कुत्ते, खूखार कुत्ते पड़ता है। कहीं रखना चाहते हैं, कहीं पड़ जाता है। अभी तो हम छोड़े, इतने से भी लोगों को न लगा तो लोग उठा उठाकर उनके कहते कुछ हैं, मतलब कुछ होता है; करना कुछ चाहते थे, कर शरीर के ऊपर फेंकते थे, वे नीचे गिरते थे-चट्टानों पर। लोग कुछ जाते हैं। अभी जीवन एक सरल घटना नहीं है। और अभी | बहुत नाराज थे। इस नाराजगी में कारण था। कारण यह था कि हम इस सरलता को पा भी न सकेंगे; क्योंकि हम तो अपनी हम हैं जटिल लोग। जब भी कोई सरल आदमी पैदा होता है, जटिलता को ही सरलता समझे बैठे हैं। हम तो अपनी जटिलता उसे हम बर्दाश्त नहीं कर पाते। वह बड़े गहरे में हमें के लिए बड़े तर्क खोजते हैं। अपमानजनक मालूम पड़ता है। उसकी मौजूदगी हमें चुभती है, अगर तुम्हें क्रोध आ जाता है तो तुम सीधा-सीधा थोड़े ही शूल की तरह चुभती है। बेईमान चाहते हैं, बाकी भी लोग कहते हो कि मैं क्रोधी आदमी हूं। तुम कहते हो, क्रोध की जरूरत बेईमान हों। अगर ईमानदार आदमी बेईमानों के बीच में हो तो थी; अगर क्रोध न करेंगे तो यह बेटा सुधरेगा कैसे? अब तुम | बेईमान उसे बर्दाश्त न करेंगे। उनके लिए खतरा है वह ईमानदार ग्रंथि को तो स्वीकार कर ही नहीं रहे हो कि तुम क्रोधी हो। तुम आदमी; क्योंकि उसकी ईमानदारी के कारण उनकी बेईमानी यह कह रहे हो कि यह तो बेटे को सुधारने के लिए करना पड़ रहा | | साफ हुई जाती है, उघड़ी जाती है। चोर चोर को पसंद करते हैं। है। तुम बहाने में टाले दे रहे हो, तो यह ग्रंथि तो मजबूत होती | झूठ बोलनेवाले झूठ बोलनेवाले को पसंद करते हैं। जैसे लोग चली जायेगी। यह ग्रंथि तो घनी होती चली जायेगी। होते हैं, वैसों को पसंद करते हैं। महावीर जैसा निग्रंथ आदमी, दूसरा करता है, तो तुम कहते हो, अहंकारी; तुम करते हो तो जिसकी कोई ग्रंथि नहीं, कोई उलझाव नहीं, जैसा है सीधा-सरल कहते हो, स्वाभिमान है। अगर तुम्हें कोई नई सझ आती है तो | नग्न खड़ा हो गया-लोगों को बड़ी कठिनाई हो गई। लोग इसे तुम कहते हो, मौलिक चिंतन; अगर दूसरे को आती है, तुम बर्दाश्त न कर सके। लोग उनको एक गांव से दूसरे गांव में कहते हो, झक्की है, दिमाग थोड़ा ढीला है, इस तरह की बातें खदेड़ने लगे। लेकिन यह आदमी भी खूब था। इसने सब इसके दिमाग में उठती हैं। स्वीकार कर लिया। इसने कहा कि यह भी हो रहा है तो होने दो। तुम करते हो तो तुम कुछ और शब्द देते हो; दूसरा करता | इसने कुछ बदलने की कोशिश न की। जिस गांव से इसे भगाया 3821 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org