SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 11
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ काम वासना है दूसरे की खोज महावीर कहते हैं कि जो ऊर्जा इस जगत में प्राणियों को जन्म देने के काम आती है वही ऊर्जा स्वयं को उस जगत में जन्म देने के काम आती है। ऊर्जा वही है-आत्म जन्म, खुद का ही पुनर्जन्म, उसके ही लिए काम आती है। तो महावीर के तर्क अलग हैं। महावीर कहते हैं- और अब तो विज्ञान समर्थन देता है, एक संभोग में कोई दस करोड़ सेल, वीर्याणु छूटते हैं- तो महावीर कहते हैं, एक संभोग में दस करोड़ जीवन छूटते हैं, दो घंटे के भीतर वे सब मर जाते हैं। तो प्रत्येक संभोग में दस करोड़ जीवन की हत्या का पाप है। और एक आदमी अगर अपने जीवन में संयमपूर्वक संभोग करे तो चार हजार संभोग कर सकता है। चार हजार संभोग में, प्रति संभोग में दस करोड़ जीवाणु नष्ट होते हैं। तो आप गणित को फैला दें। अगर आपके दस-पांच बच्चे पैदा भी हो जाते हैं तो अरबों खरबों जीवन की हत्या पर। ___ जीवन बड़ा अदभुत है। दस करोड़ जीवाणु छूटते हैं संभोग में और उनमें संघर्ष शुरू हो जाता है उसी वक्त / बाजार में ही प्रतियोगिता नहीं है. दिल्ली में ही प्रतियोगिता नहीं है। जैसे ही दस करोड ये जीवाण स्त्री योनि में मक्त होते हैं. इनमें संघर्ष शरू हो जाता है। ये दस करोड़ लड़ने लगते हैं आपस में कि कौन आगे निकल जाये। क्योंकि एक ही स्त्री अंडे तक पहुंच सकता है। वे जो ओलंपिक में दौड़े होती हैं वे कुछ भी नहीं हैं। बड़ी से बड़ी दौड़, जिसका आपको पता भी नहीं चलता, जिस पर सारा जीवन निर्भर होता है, वह बड़े अज्ञात में होती है। ये दस करोड़ धावक दौड़ पड़ते हैं। इनमें से एक पहुंच पाता है। बाकी सब मर जाते हैं रास्ते में और वह एक भी सदा नहीं पहुंच पाता। जितनी जमीन की संख्या है इस वक्त, इतनी संख्या एक आदमी पैदा कर सकता है। साढ़े तीन अरब लोग हैं। एक-एक आदमी के पास उसके वीर्य में इतने जीवाणु हैं कि साढ़े तीन अरब लोग पैदा कर दें। एक आदमी एक जीवन में इतनी हत्याएं करता है। ये सब मर जाते हैं, ये बच नहीं सकते। महावीर का हिसाब यह है कि यह बड़ी हिंसा है इसलिये अब महावीर अब्रह्मचर्य को हिंसा कहते हैं। यह बड़ी भारी महान हिंसा है क्योंकि इतने प्राण! यह सारी की सारी ऊर्जा रूपांतरित हो सकती है और इस सारी ऊर्जा के आधार पर स्वयं का नव-जन्म हो सकता है। फिर महावीर यह भी नहीं मानते कि इस जगत का होना कोई अनिवार्यता है। यह न हो तो कुछ हर्जा नहीं है। क्योंकि इसके होने से सिवाय हर्जे के और कुछ भी नहीं होता। यह पृथ्वी खाली हो तो हर्जा क्या है? आप न हुए तो ऐसा क्या बिगड़ जाता है? फूल ऐसे ही खिलेंगे, चांद ऐसा ही निकलेगा, समुद्र ऐसी ही दहाड़ मारेगा, हवाएं इतनी ही शान से बहेंगी, सिर्फ बीच में आपके मकानों की बाधा न होगी। आपके होने न होने से फर्क पड़ता है? आप नहीं हुए तो क्या होता है? आपके होने से जमीन सिर्फ एक नरक बन जाती है। महावीर कहते हैं, यह जो चेतना रोज-रोज शरीर में उतरती है, उपद्रव ही पैदा करती है। इसे शरीर से मुक्त करना है और किसी दूसरे लोक में इसको जन्म देना है, जहां कोई संघर्ष नहीं है। मोक्ष और संसार में इतना ही अर्थ है। ___ संसार में हर चीज संघर्ष है, हर चीज, चाहे आपको पता चलता हो या न पता चलता हो। यहां एक श्वास भी मैं लेता हूं तो किसी की श्वास छीनकर लेता हूं। यहां मैं जीता हूं तो किसी को मार कर जीता हूं। यहां होने का अर्थ ही किसी को मिटाना है। यहां कोई उपाय ही नहीं है, यहां जीवन मौत से ही चलता है। यहां हिंसा भोजन है। चाहे कोई मांस खाता हो या न खाता हो, पशु-पक्षी मारता हो न मारता हो; लेकिन कुछ भी खाता हो, सब भोजन हिंसा है। हिंसा से बचा नहीं जा सकता। कोई उपाय नहीं है। ___तो महावीर कहते हैं, एक ऐसा लोक भी है चेतना का, जहां कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है, जहां कोई संघर्ष नहीं है। ध्यान रहे, सारा संघर्ष शरीर के कारण है। आत्मा के कारण कोई भी संघर्ष नहीं है। इस पृथ्वी पर भी जो लोग आत्मा को पाने में लगते हैं, उनका किसी से कोई संघर्ष नहीं है। 413 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.340022
Book TitleMahavir Vani Lecture 22 Kamvasna Hai Dusre ki Khoj
Original Sutra AuthorN/A
AuthorOsho Rajnish
PublisherOsho Rajnish
Publication Year
Total Pages1
LanguageHindi
ClassificationAudio_File, Article, & Osho_Rajnish_Mahavir_Vani_MP3_and_PDF_Files
File Size71 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy