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[ कर्म सिद्धान्त
१
प्रकार दर्शनावरण कर्म भी पदार्थों के सामान्य धर्म के बोध को रोकता है, ' तात्पर्य यह है कि इसके प्रभाव से वस्तु तत्त्व के सामान्य धर्म का बोध नहीं हो
सकता ।
दर्शनावरणीय कर्म की उत्तर प्रकृतियाँ निम्नलिखित हैं
५- निद्रा ६ - निद्रानिद्रा
७- प्रचला
८- प्रचलाप्रचला - स्त्यानद्धि
१ - चक्षुदर्शनावरण
२- प्रचक्षुदर्शनावरण
३- अवधिदर्शनावरण
४- केवलदर्शनावरण
दर्शनावरणीय कर्म भी देशघाती और सर्वघाती के भेद से दो प्रकार का है । चक्षु, अचक्षु और अवधिदर्शनावरण ये तीन प्रकृतियां देशघाती हैं और इनके अतिरिक्त छह प्रकृतियाँ सर्वघाती हैं । सर्वघाती प्रकृतियों में केवल दर्शनावरण प्रमुख हैं । दर्शनावरण का पूर्णतः क्षय होने पर जीव की अनन्त दर्शन-शक्ति प्रगट हो जाती है, जब उसका क्षयोपशम होता है तब चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन और अवधिदर्शन का प्रगटन होता है । इस कर्म की उत्कृष्ट स्थिति तीस कोटाकोटि सागरोपम की और न्यूनतम स्थिति अन्तर्मुहूर्त की है ।
३. वेदनीय कर्म :
वेदनीय कर्म आत्मा के अव्याबाध गुण को आवृत्त करता है । इसके उदय से आत्मा को सुख-दुःख की अनुभूति होती है, यह दो प्रकार का है - सातावेदनीय और साता वेदनीय । सातावेदनीय कर्म के प्रभाव से जीव को भौतिक सुखों की उपलब्धि होती है और असातावेदनीय कर्म के उदय होने पर दुःख
१. ( क ) प्रथम कर्मग्रन्थ - 8 (ग) स्थानांग सूत्र २/४/१०५ ।। टीका
२. ( क ) समवायाङ्ग सूत्र
( ग ) प्रज्ञापना सूत्र - २३/१ ॥
(ख) गोम्मटसार कर्मकाण्ड - २१
३. ( क ) उत्तराध्ययन सूत्र - ३३/१६-२०
४. ( क ) स्थानांग सूत्र २ / १०५ ।।
( ख ) प्रज्ञापना सूत्र पद - २६ उ० २ सूत्र - २९३
(ग) तत्त्वार्थ सूत्र - ८ / १५ ।
(घ) पंचम कर्म ग्रन्थ गाथा - २६
(ख) स्थानांग सूत्र ८ / ३ / ६६८ (घ) उत्तराध्ययन सूत्र ३३ / ५
८
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(ख) वेयणीयं पि दुविहं सायमसायं च श्राहियं ॥
उत्तराध्ययन सूत्र - ३३/७
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