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________________ प्रकीर्णक-साहित्य: एक परिचय ईसवी सन् की प्रथम शती से लेकर पाँचवी शती के बीच माना है। विषयवस्तु :- तंदुलवैचारिक में प्राणिविज्ञान सम्बन्धी कई प्रासंगिक बातों का समावेश किया गया है। इसके प्रारम्भ में गर्भावस्था की अवधि, गर्भोत्पत्नियोग्य योनि का स्वरूप, स्त्रीयोनि तथा पुरुषवीर्य का प्रम्लानकाल, गर्भापति एवं गर्भगत जीव का विकास क्रम, गर्भगत जीव का आहार परिणाम, गर्भगत जीव के माता और पिता सम्बन्धी अंग, गर्भावस्था में मरने वाले जीव की गति, गर्भ के चार प्रकार, गर्भनिष्क्रमण, गर्भवास का स्वरूप, मनुष्य की सौ वर्ष की आयु का दस दशाओं में विभाजन का वर्णन, जीवन की दस दशाओं में सुख दुःख के विवेकपूर्वक धर्मसाधना का उपदेश, वर्तमान मनुष्यों के देह - संहनन का ह्रास, धार्मिक जन की प्रशंसा आदि का विस्तृत निरूपण किया गया है। Jain Education International इस ग्रन्थ में सौ वर्ष के व्यक्ति द्वारा साढ़े बाईस वाह (संख्या विशेष) तंदुल खाये जाने का वर्णन कर उस व्यक्ति द्वारा खाये जाने वाले स्निग्ध द्रव्य और लवण का माप तथा उसके परिधान वस्त्रों का प्रमाण भी बताया है । समय, आवलिका आदि काल मान तथा कालमानदर्शक घड़ी को बताने के लिये घड़ी बनाने की विधि बताई है । तदनन्तर एक वर्ष के मास, पक्ष और अहोरात्र का परिमाण तथा अहोरात्र, मास, वर्ष और सौ वर्ष के उच्छ्वास की संख्या बताई गई है। अन्त में अनित्यता का स्वरूप, शरीर का स्वरूप उसका असुन्दरत्व और अशुभत्व, अशुचित्व आदि का निरूपण किया गया है। स्त्री के अंगोपांगों का निरूपण कर वैराग्य उत्पत्ति हेतु नाना प्रकार से उसे अशुनि और दोषों का स्थान बताया है। धर्म के माहात्म्य का प्रतिपादन करते हुए उपसंहार करते हुए कहते हैं कि इस शरीर का गणित से अर्थ प्रकट कर दिया है अर्थात् विश्लेषण करके उसके स्वरूप को बता दिया है, जिसे सुनकर जीव सम्यक्त्व और मोक्षरूपी कमल को प्राप्त करता है। ११.५ । उन इस ग्रन्थ की अद्वितीय और दुर्लभ विशेषता है कि इसमें सभी विषयों को पहले व्यवहार गणित द्वारा देखा गया है तदनन्तर उसे सूक्ष्म और निश्चयगत गणित से समझने का प्रयोजन प्रस्तुत किया गया है T ३. चंदावे ज्झयं पइण्णय चन्द्रावेध्यक प्रकीर्णक इसे चन्द्रवेध्यक प्रकीर्णक भी कहते हैं ! चन्द्रवेध्यक प्रकीर्णक की अनेक गाथाएँ आगमों में उत्तराध्ययन, ज्ञाताधर्मकथा और अनुयोगद्वार में नियुक्तियों में आवश्यकनिर्युक्ति, उत्तराध्ययननियुक्ति, दशवैकालिकनियुक्ति और ओघनियुक्ति में; प्रकीर्णकों में मरणविभक्ति, भक्तपरिज्ञा, आतुरप्रत्याख्यान, तिन्थोगाली, आरधनापताक एवं गच्छाचार में; तथा यापनीय एवं दिग्म्बरपरम्परा मान्य '— انا For Private & Personal Use Only 465 www.jainelibrary.org
SR No.229843
Book TitlePrakirnak Sahitya Ek Parichay
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSushma Singhvi
PublisherZ_Jinavani_003218.pdf
Publication Year2002
Total Pages15
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size227 KB
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