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________________ आगम साहित्य में प्रकीर्णकों का स्थान,महत्व,रचनाकाल एवं रचयिता ... 455 ऋषिभाषित उस काल का ग्रन्थ है, जब जैनधर्म सीमित सीमाओं में आबद्ध नहीं हुआ था वरन् उसमें अन्य परम्पराओं के श्रमणों को भी आदरपूर्वक स्थान प्राप्त था। इस ग्रन्थ की रचना उस युग में संभव नहीं थी, जब जैनधर्म भी सम्प्रदाय के शुद्र घेरे में आबद्ध हो गया। लगभग ई.पू. तीसरी शताब्दी से जैनधर्म में जो साम्प्रदायिक अभिनिवेश दृढ़ हो रहे थे, उसके संकेत सूत्रकृतांग और भगवतीसूत्र जैसे प्राचीन आगमों में मिल रहे हैं। भगवतीसूत्र में जिस नखलिपुत्र गोशालक की कट आलोचना है, उसे ऋषिभाषित अर्हत् ऋषि कहता है। आतुरप्रत्याख्यान, महाप्रत्याख्यान, तंदुलवैचारिक, मरणविभक्ति आदि प्रकीर्णक साहित्य के ऐसे ग्रन्थ है-- जो सम्प्रदायगत आग्रहों से मुक्त है। सूत्रकृतांगसूत्र में ऋषिभाषित के अनेक ऋषियों का सम्मानपूर्वक उल्लेख और उन्हें अर्हत् परम्परा द्वारा सम्मत माना जाना भी यही सूचित करता है कि ऋषिभाषित जैसे कुछ प्राचीन प्रकोणकों की भाषा का अर्धमागधी स्वरूप तथा आगमों को अपेक्षा उनकी भाषा में महाराष्ट्री भाषा की अल्पता भी यही सिद्ध करती है कि ये ग्रन्थ प्राचीन स्तर के हैं। नन्दीसूत्र में प्रकीर्णक के नाम से अभिहित नौ ग्रन्थों का उल्लेख भी यही सिद्ध करता है कि कम से कम ये नौ प्रकीर्णक तो नन्दीसूत्र से पूर्ववर्ती हैं। नन्दीसूत्र का काल विद्वानों ने विक्रम की पांचवी शती माना है, अत: ये प्रकीर्णक उससे पूर्व के हैं। इसी प्रकार समवायांग सूत्र में स्पष्ट रूप से प्रकीर्णकों का निर्देश भी यही सिद्ध करता है कि समवायांगसूत्र के रचनाकाल अर्थात् विक्रम की तीसरी शती में भी अनेक प्रकीर्णकों का अस्तित्व था। इन प्रकीर्णकों में देवेन्द्रस्तव के रचनाकार ऋषिपालित है। कल्पसूत्र स्थविरावली में ऋषिपालित का उल्लेख है। इनका काल ईसा पूर्व प्रथम शती के लगभग है। इसकी विस्तृतचर्चा हमने देवेन्द्रस्तव की प्रस्तावना में की है। अभी-अभी संबोधि पत्रिका में श्री ललित कुमार का एक शोध लेख प्रकाशित हुआ है, जिसमें उन्होनें पुरातात्विक आधारों पर यह सिद्ध किया है कि देवेन्द्रस्तव की रचना ई.पू. प्रथम शती में या उसके भी कुछ पूर्व हुई होगी। प्रकीर्णकों में निम्नलिखित प्रकीर्णक वीरभद्र की रचना कहे जाते हैंचउसरण, आउरपच्चक्खाण, भत्तपरिण और आराधनापताका। आराधनापताका की प्रशस्ति में विक्कमनिवकालाओ अट्टुत्तरिम-समासहस्सम्मि' या पाठभेद से अलुत्तरोत्तरसमासहस्सम्मि' के उल्लेख के अनुसार इनका रचनाकाल विक्रम संवत् १००८ या १०७९ सिद्ध होता है। इस प्रकार प्रकीर्णक नाम से अभिहित ग्रन्थों में जहां ऋषिभाषित ई.पू. पांचवी शती की रचना है, वहीं आराधनापताका ई सन् की दसवीं या ग्यारहवीं शती के पूर्वार्द्ध की रचना है। इस प्रकार प्रकीर्णक साहित्य में समाहित ग्रन्थ लगभग पन्द्रह सौ वार्टी की सूदीर्घ अवधि में निर्मित होते रहे हैं, फिर भी चउसरण, परवर्ती Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229842
Book TitleAgam Sahitya me Prakirnako ka Sthan Mahattva Rachnakal evam Rachayita
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherZ_Jinavani_003218.pdf
Publication Year2002
Total Pages9
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size155 KB
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