SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 2
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ 224 । जिनवाणी । | 15,17 नवम्बर 2006|| गाथार्थ- आराधना में तीन ही प्रतिक्रमण होते हैं। पहला सर्वातिचार प्रतिक्रमण है। दूसरा त्रिविध आहारत्याग प्रतिक्रमण है। यावज्जीवन पानक आहार का त्यागना उत्तमार्थ नाम का तीसरा प्रतिक्रमण होता है। आचारवृत्ति (वसुनन्दिकृत)- क्रम को बतलाने के लिए यह गाथा है। दीक्षाकाल का आश्रः लेकर आज तक जो भी दोष हुए हैं, उन्हें सर्वातिचार कहा गया है! संलेखना ग्रहण करके यह क्षपक पहले सर्वातिचार प्रतिक्रमण करता है। पुनः तीन प्रकार के आहार का त्याग करना द्वितीय प्रतिक्रमण है और अन्त में यावज्जीवन मोक्ष के लिए पानक वस्तु का भी त्याग कर देना उत्तमार्थ नामक तृतीय प्रतिक्रमण कहलाता है। अर्थात् प्रथम सर्वातिचार प्रतिक्रमण, द्वितीय त्रिविधाहार का प्रतिक्रमण और तृतीय यावज्जीवन पानक के त्याग रूप उत्तमार्थ प्रतिक्रमण है। मिच्छत्तपडिक्कमणं तह चेव असंजमे पडिक्कमणं । कसाटसु पडिक्कमणं जोगेसु य अप्पसत्थेसु।। -मूलाचार, षडावश्यकाधिकार, गाथा ६१९ गाथार्थ- मिथ्यात्व का प्रतिक्रमण, असंयम का प्रतिक्रमण, कषायों का प्रतिक्रमण और अप्रशस्त योगों का प्रतिक्रमण, यह भाव प्रतिक्रमण है। भावेण अणुवजुत्तो दव्वीभूदो पडिक्कमदि जो दु। जस्सटें पडिकमदे तं पुण अठं ण साधेदि ।। ___-मूलाचार, षडावश्यकाधिकार, गाथा ६२६ गाथार्थ- जो भाव से उपयुक्त न होता हुआ द्रव्यरूप प्रतिक्रमण करता है, वह जिस प्रयोजन से प्रतिक्रमण करता है उस प्रयोजन को सिद्ध नहीं कर पाता है। भावेण संपजुत्तो जदत्यजोगो य जंपदे सुत्तं । सो कम्मणिज्जराएविउलाए वट्टदे साधू ।। मूलाचार, षडावश्यकाधिकार, गाथा ६२७ गाथार्थ- भाव से युक्त होता हुआ जिस प्रयोजन के लिए सूत्र को पढ़ता है, वह साधु विपुल कर्मनिर्जरा में प्रवृत्त होता है। मुक्खट्ठी जिदणिदो सुत्तत्थविसारदो करणसुद्धो। आदबलविरियजुत्तो काउस्सग्गी विसुद्धप्पा ।। -मूलाचार, षडावश्यकाधिकार, गाथा ६५३ , गाथार्थ- मोक्ष का इच्छुक, निद्राविजयी, सूत्र और उसके अर्थ में प्रवीण, क्रिया से शुद्ध, आत्मा के बल और वीर्य से युक्त, विशुद्ध आत्मा कायोत्सर्ग को करने वाला होता है। संवच्छरमुक्कस्सं भिण्णमुहत्तं जहण्णयं होदि । सेसा काओसग्गा हॉति अणेगेसु ठाणेसु ।।। -मूलाचार, षडावश्यकाधिकार, गाथा ६५८ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229775
Book TitleMulachar me Pratikraman evam Kayotsarga
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShweta Jain
PublisherZ_Jinavani_002748.pdf
Publication Year2006
Total Pages4
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size87 KB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy